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| सुरेंद्र प्रजापति |
अनहद कोलकाता सम्मान समारोह पर
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रविवार या इतवार 21 जनवरी 2024. मनीषा त्रिपाठी फाउंडेशन फिल्म तथा बेव पत्रिका अनहद कोलकाता की ओर से दिया जानेवाला मनीषा त्रिपाठी स्मृति अनहद कोलकाता सम्मान 2023 के समारोह में मुझे शामिल होने का गौरव प्राप्त हुआ, जो भारतीय साहित्य कला एवं संस्कृति का संयुक्त मंच है।
मेरे लिए यह चकित और आहलादित्य कर देने वाला पहला अवसर था। अनहद कोलकाता के सम्पादक और युवा कविता के महत्वपूर्ण चितेरे, लोकप्रिय कवि, लेखक, अनुवादक डाक्टर विमलेश त्रिपाठी का मेरे उपर विशेष अनुग्रह रहा होगा या उनका हिंदी साहित्य के प्रति समर्पण, कि मै इस स्मरणीय दिवस का साक्ष्य बना। यह विचित्र और उत्साहित कर देने विलक्षण समय था, जिसके लिए मेरे अंदर का एक ईमानदार और संवेदनशील जिज्ञाशा लालायित भी रहा है। गुरु रविंद्र नाथ टैगोर की पावन भूमि पर, गंगा (हुगली) किनारे मै महादेवी वर्मा की घीसा था (जो गंगा किनारे अपने गुरु महादेवी वर्मा को गुरुदक्षिणा देने के लिए अपनेकपटी मित्र को अपना कमीज बेच कर कोहड़ा लेकर प्रस्तुत हुआ था।) वस्तुतः उसके उलट मै कोई गुरुदक्षिणा देने नहीं बल्कि अपनेगुरु और बड़े भाई समान डॉक्टर विमलेश त्रिपाठी से जीवन के कुछ महत्वपूर्ण सूत्र लेने लेने के लिए प्रस्तुत हुआ था। और जो सिखा शायद वह ज्ञान किसी बड़े यूनिवर्सिटी में नहीं मिलता। चूँकि उस योग्य मै हूँ भी नहीं। मुझे प्रसन्नता था, और आश्चर्य भी। चकित भी था और उत्साहित भी। वो इसलिए कि पिछले एक वर्ष से डॉक्टर विमलेश त्रिपाठी सर से शोशल मीडिया के माध्यम से मेरा परिचय हुआ था। और उनके सम्पर्क में आकर मुझे लगा कि मै भी कुछ कर सकता हूँ। वरिष्ठ होने का कदाचित भूख तो नहीं था मुझे, लिखने पढ़ने का भूख अवश्य था। उनका मृदुभाषी स्वभाव, मित्रवत व्यवहार, और उनका नैसर्गिक चरित्र बिल्कुल उन्हीं के सच्ची काव्य पंक्तियों के अनुरूप मुझे रोमांचित किया।
चूँकि उनके सम्मान में कुछ कह पाना या उनका बड़ाई करना एक सच्चे और अच्छे व्यक्तित्व के कद को छोटा करना होता है। मै वह पाप कदापि नहीं करूँगा। मुझे तो उनके स्नेह सिक्त छाया में रहकर उनके सम्मान में बहते जाना है। सम्भव है, मै स्वयं को कुछ हद तक सामर्थ बना पाऊँ। डॉ. विमलेश त्रिपाठी एक ऐसे आसाधारण प्रतिभा के सर्जक हैं जो शब्द नहीं शब्दकार रचते हैं। क्षमा करेंगे...शायद कुछ विशेष कह दिया हो तो...!
अनहद कोलकाता सम्मान समारोह में भिन्न-भिन्न प्रदेश से आए हुए गणमान्य साहित्य के लोकप्रिय मनीषी उपस्थित हैं और मै उनके बीच उपस्थित होकर भी अनुपस्थित हूँ। मेरा ईमानदार तर्क उस अस्मरणीय पल को सिर्फ सुखद मायूसी से टुकुर-टुकर ताक रहा है और रहरहकर मुझे फटकार रहा है-- "इन हंसों की पांत में बगुला किधर से...!
खैर यह मेरा इस अद्भुत समारोह के शुरु होने के पहले की प्रस्तावना है। अब मै सारे आते-जाते विचारों को झटकता हूँ। खुद को खुसामद करता हूँ। खुद को मनाता हूँ।
अब सीधा सामारोह की बात की जाए। मै कोई भाषा का मर्मज्ञ, हिंदी का ज्ञाता या कोई टिप्पणीकार नहीं हूँ। हिंदी व्याकरण से मेरा छतीस का आंकड़ा चलता है। अपितु एक जिज्ञाशा है,। अभिलाशा है कि मै कुछ लिखूँ।
मनीषा त्रिपाठी स्मृति अनहद कोलकाता सम्मान के लिए चयनित एक परिपक्व, समृद्ध, और वरिष्ठ कवि, कथाकार और लेखक मान्यवर अभिज्ञात जी को तृतीय अनहद कोलकाता सम्मान 2023 दिया जाना वास्तव में अद्भुत था जिसके वे एक ईमानदार और प्रयोगधर्मी साहित्यकार के रूप में असली हकदार थे। उन्हे बहुत-बहुत धन्यवाद व शुभकामनाएँ। मै उनका कोई एकाग्र पुस्तक तो नहीं पढ़ पाया हूँ लेकिन कुछ-कुछ रचनाओं को अवश्य पढ़ा है। उन्होंने अपने लेखन में वंचित और शोषित वर्ग के ज्वलंत मुद्दों को उठाया है व रचना और जीवन के बीच व्याप्त विषमता को पाटने के लिए लगातार कलम चला रहे हैं। निचले और पीड़ित तबके की पीड़ा को उन्होंने पुरजोर तरीके से अपनी लेखनी की ताकत बनाया है। और यही उनकी विशिष्टता है।
समारोह की शुरुआत करते हुए कोलकाता में ही प्रवास कर रहे वरिष्ठ लेखिका और आलोचक गीता दुबे ने अभिज्ञात के लिखे कहानी संग्रह पर विवेचनात्मक टिप्पणी के क्रम में बहुत ही सार्थक और साफ सुथरी बात कहीं। आलोचना किन्ही भी रचनाकार की रचना को समृद्ध बनाती है। निखारती खंघालती है। एक सार्थक साहित्य को लिखने के लिए परिपक्व बनाती है। गीता दुबे इसके लिए धन्यवाद के पात्र हैं। इसी कड़ी में महाराष्ट्र से चलकर आये युवा वरिष्ठ कवि-कथाकार और अनुवादक संजय बोरुडे की उपस्थिति और उनकी अभिज्ञान जी के कृतियों पर लघु चर्चा सराहनीय रहा। संजय बोरुडे, विमलेश त्रिपाठी के एक लोकप्रिय कविता संग्रह "कविता में लम्बी उदासी" का मराठी भाषा में अनुवाद और प्रकाशन उनकी रचनात्मक गतिशीलता को प्रबुद्ध करता है, जिसका विमोचन इस साहित्यिक उत्सव में होना बेहद प्रसंसनीय रहा। वे इस बात का भी संकेत करते गये कि अन्य भरतीय भाषाओं के पास अपार संभावनाएँ हैं और हम सब को साथ मिलकर काम करना चाहिए। उनके साथ समारोह के बाद बिताए गये तीन चार घंटे हमारे लिए बेहद महत्वपूर्ण रहा। उनसे बहुत कुछ जानने समझने को मिला। हावड़ा से गया तक उनके साथ का रेलवे सफर भी हमारे स्मरण में बेरोक टोक प्रकट होने के लिए मेरे डायरी के पन्नो में दर्ज हो गया। हिंदी की श्रेष्ठ पत्रिकाओं में प्रमुखता से छपने वाले सेराज खान बातिस का साथ होना मेरे लिए बहुत ही खास था।
कलकता में प्रवास कर रहे और एक अतिक नाम से निकलने वाले हिंदी की लघु पत्रिका के सम्पादक, युवा कवि, लेखक नील कमल जी का काव्य पाठ स्वागत योग था। विशिष्ठ प्रतिभा के धनी और महत्वपूर्ण कवि लेखक और मेरे गुरु समान वरिष्ठ रचनाकार शैलेन्द्र शान्त, महत्वपूर्ण रचनाकार नीलय उपाध्याय जिनका कविता पाठ मकई के बाल शीर्षक से किया गया, बहुत कुछ संदेश देता है। वह छोटी सी कविता में खेतोँ में खटते किसान के संवेदनओं की अकुलाहट है। वह मेरे लिए भी महत्वपूर्ण था।
कोलकाता से ही प्रमुख रचनाकार और कवि फ़े सीन इजाज अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में इस कार्यक्रम को सराहनीय कार्य को सरहा। उनका एक छोटा का अफसाना दर्शकों का अच्छा मनोरंजन किया।
और अंत मे विमलेश त्रिपाठी धन्यवाद ज्ञापन करते हुए एक सफल, और सुखद समारोह का समापन किए। समारोह मे उपस्थित सभी श्रेष्ठ कवियों को उन्होंने अनहद कोलकाता का मोमेंटो और प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया। उनके द्वारा दिया गया सम्मान उनके उदार व्यक्तित्व, हिंदी साहित्य के प्रति उनका उतरोतर उमगता प्रेम और अन्य सभी रचनाकारों को अपनी रचना की कसौटी पर खरा उतरने, एक ईमानदार और वास्तविक, सच्ची चीजों को अपनी रचना का माध्यम बनाने का जो संदेश देते हैं वह एक सराहनीय कार्य है। इसके लिए मैं पुनः पुनः डॉक्टर विमलेश त्रिपाठी सर को अभिनंदन करता हूँ।
और अंत में____
पुनः मिलने के लिए बिछड़ना होता है,
पेड़ बनने के लिए बीज को फटना होता है।
आगमन और प्रस्थान ही तो जीवन है,
जल के लिए वर्फ को पिघलना होता है।।
©®सुरेन्द्र प्रजापति
23/ 02/2023
(बाएं से) वरिष्ठ लेखक अनुवादक संजय बोरुडे, सुरेंद्र प्रजापति, कवि लेखक अभिज्ञान, फ़े सीन इजाज, वरिष्ठ कवि शैलेन्द्र शान्त, एवं वरिष्ठ लेखिका गीता दुबे।
सुरेन्द्र प्रजापति
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