रूपक
समय की चकाचौंध में
तुम जो देखते हो
स्याह अनहरिया में
मीट जाता है उसका वजूद
और पीछे प्रकाश में नहा उठता है
उसकी कायर पवित्रता
इस स्वप्निल रात में
सच अपना माथा पीट रहा है
झूठ की देहरी पर
नाजुक कोमलता
अपने रुपक बदल रही है
इंसान और शैतान में
अब फर्क करना है है
रेंगते जा रहे हैं लोग
सभ्यता की पताका तरबतर है
छल के जहरीले पानी से
शोर बढ़ता जा रहा हूँ
चीख और डरावनी हो रही है
इधर__
अन्याय का तिलक हो रहा है
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खेत में बिखर जाता हूँ
प्रभात की पहली किरणें मुझे जगाती है
मैं जगाता हूँ अपने बिखरे हुए श्रम को
पैरों में फ़टी विवाईया और अलसाए हुए गम को
जोगाता हूँ माटी और भोथरी धार कुदाल को
और पुरे मशक्कत से लड़ता हूँ
हाँफते हुए, काँपते हुए,पसीने से नहाता हूँ
टप-टप लहु बहाते हुए
बंजर से टकराता हूँ
मैं आग को फूँक मारकर सुलगाता हूँ
उसके राख बनने तक देह को तपाता हूँ
तड़पाता हूँ, थक कर आघाता हूँ
भूख से बिलबिलाते अतड़ियों को
शोक को फटकारते हुए
रोग को रीरियाता हूँ
दुःख के घने अंधेरे को चेताते
अपनी दीनता को गरियाता हूँ
मैं लड़ता-झगड़ता, तपता सुलगता
अंत में खेत में बिखर जाता हूँ
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विकटोरिया पैलेस की मैं
विकटोरिया पैलेश की तरह
मैं संरक्षित कर रहा हूँ शब्दों को
जो बीजों को पालेंगे
मिट्टी को नमी देंगे
हवा को बे रोक-टोक बहाएंगे
मेरे खेतों को बचाएँगे
दुबों पर झिलमिलाते
ओस की दुर्लभ मोतियों के बनिस्पत
क्या है कोई बेशकीमती मोती
दुनिया के किसी संग्रहालय में
इसीलिए मैं मेड को बचाऊंगा
जब सांय-सांय करने लगे रात का अनहरिया
खूब डरावनी लगने लगे झींगुर की बोली
कुत्तों का भौंकना खौफ भर दे पसलियों में
मैं राजघराने की मशाल की भाँति
खेतों में लठ जलाऊँगा
जब नीलगाय रौंदने आएँगे फ़सलों को
सियार लगातार रोयेंगे
मैं जोर-जोर से चिल्लाऊँगा
धक-धक करते कलेज़े से दहाड़ूँगा
बिजूका बनाकर खेतों में
लाल पताका लगाऊँगा
कांटेदार बेल से घेराव बनाऊँगा
जब महानगरों में राशन की किल्लत होगी
रोटी और पानी के लिए झगड़े होंगे
जब स्वार्थ और धन के लिए युद्ध होगा
भूख के लिए हाहाकार मचेगा
मैं अपने खेत की पहरेदारी करूँगा
मैं अपने शब्दों की मिट्टी लेकर
अपने हिस्से का जमीन जोतूंगा
कि हमारी पसलियों को मिले रुधिर
श्रम के हिस्से का भूख
भूख को रोटी से तौलूंगा
मैं बीज को रोपकर पेड़ उगाऊँगा
अरहर, ज्वार, बाजरा छिटकर मेड बचाऊंगा
कोई ताज़ बचाएगा, कोई सल्लतनत
मैं अपना देह नापकर
पोर-पोर ऊर्जा को खपाकर
अपना खेत बचाऊंगा
मैं खुरपी और कुदाल बचाकर
सारा देश बचाऊंगा
मैं एक बीज रोपूँगा
उम्मीद का, सृजन का, परिवर्तन का, क्रांति का
अंत मे असीमित प्रेम का
प्रेम का बीज आँखों में पनपेंगे
संघर्ष का आँसू रोयेंगे
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परिश्रम
तुम खेतों में मेहनत करते हो
तुम जो पसीना बहाते हो
तुम फ़सल उगाकर दांव गवाते हो
तुम जानते क्या हो?
कौन सा शब्द अधिक अर्थवान है इस दुनिया में
कौन सी कला अद्वितीय है विश्व में
कौन सी कविता सबसे सुंदर है?
चौंको मत
अपने खेतों में लहलहाते फ़सलों को देखो
उसकी समीक्षा करते शब्दों को ढूंढो
ढूंढो और अनुभव करो
अनुभव करो और विचार करो
खेती के शब्द, श्रमिक हथियार
श्रम की कविता
फ़सल बोने से उगाने तक की यात्रा
जीवन के सुख-दुःख के थपेड़ों को सहते
अपने वाजीव हक के लिए लड़ते
जब एक दिन शुक्रिया जीवन
अलविदा दुनिया कहेंगे
तुम्हारे पास क्या बचा रह जाएगा
तुम्हारे साथ कौन कहाँ जाएगा?
श्रम से बने मकान, शस्त्र कुदाल
दुनिया के सारे उपकरण फेल हो जाएँगे एक दिन
तब भी बचा रह जाएगा
खुरपी, फावड़ा, कुदाल
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ईमानदारी
जीतना एक स्वप्न है
जबकि हारना
नित्य दिनचर्चा में शामिल
झूठ के विरुद्ध शब्द
कितनी तापों से झूलसती
ईर्ष्या की आग में तपति
धरती के गर्भ से फूटती
कुंदन हो जाती है
ईमानदारी जीत की कविता है
समर्पण और संकल्प उनके विश्वास
बंधु, मुझे बताओ मै कितना ईमानदार हूँ
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