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स्वयं का स्वयं से संघर्ष



अनवरत श्रम करता, खेतों में खटता
फ़सल का ख्याल हूँ
उपज मेरी कल्पना

स्वयं को रटाता हूँ, टकराता हूँ बंजर से
इस विश्वास के साथ 
कि परिश्रम कभी बाँझ नहीं होता
उम्मीद की मृत्यु नहीं होती

मैं हतभाग्य, किसानी का बेटा
अपने पिता की आश, 
माँ के किस्मत का होनहार
भाग्य का सितार

स्वयं का स्वयं से संघर्ष, 
दिवस का तर्क
जिद्द के बैलों को ललकारता
मौसम की मार से फसलों को संभालता
पत्थरों पर प्रहार करता, कुल्हाड़ी भांजता

रात्रि के तारे को ताकता
मेह को ओढ़ता
उब के कुदाल से खेत को कोड़
पीड़ा के आँसुओ से सिंचता
भूख का सुख

हरियाता, लहलहाता
झंझा से नष्ट होता
ताप से सुखता

अब इतनी कुबत कहाँ से पाऊँ
कि मेघों को बरसाऊँ 
नदियों को लाऊँ, तालों को बाँधू 

अब तो सब तरफ उड़ती धूल
सर्वत्र सुखा अकाल
उमस का दौड़ता व्याल
सब तरफ प्यास
सब तरफ भावना हताश
°°°




अपराध बोध की व्यथा


पिटे जाने की ग्लानि
अपराध-बोध की व्यथा;
पुरे माहौल को पीड़ा से भर देती है

सुख की मटमैली चादर
पूरे वजूद को जकड़ लेता है
जंजीर की तरह
जीने का अभिशाप एक टीस भर देती है

आँखे छिपने की जगह तलाशती है
स्वांग रचता षड्यंत्र फिर-फिर घेर लेता है
दिल-ओ-दिमाग दुहाई देता राहत खोजती है
नीम अंधेरे की हताशा विलाप करता है

रात के स्वप्न में कातर भीरुता, 
ललकारती__है__
स्वयं को!

__उठो... उठो...
विरोध की परिभाषा भूल गये!
दहशत में क्या लगाया जीवन का अर्थ?
अपने पीठ पर खामोशी का आवरण ओढ़े
विवशता में खौफ का बीज बोते
ऐसा जीना भी है व्यर्थ

अपने हक को गिरवी रख
उम्मीद की टूटन
सपनों की घुटन, विरान, बेचैन
रह-रह रुदन

इस बेचारगी से निकलने की अधीरता
मांगती है मौन का हिसाब
असहमति का निर्माण कर
स्वाधीन है सूर्य की किरणें
मुक्त है शब्द, स्वतंत्र है कविता
°°°


कल के स्वर्णिम सुवह के लिए


आखिर कब होगा पुरा-पुरा इन्साफ
कब मिलेगा इस अंधेर से मुक्ति
चेतना पर युक्ति

कब तक छल की बोली लगेगी
अन्याय तमाशा करेगा
कब तक हवा में विष घुलेगा
होगा कोई वैचारिक न्याय
कब तक सच कठघरे में खड़ा रहेगा
कब तक झूठ मिमियाता रहेगा

अधिकार के देवता
मौन
या विद्रोह!

व्यंग
या ललित निबंध!

तिरस्कार
या
जीवित कविता!

दयनीय अवस्था
एक अवधारणा है

अपनी भाषा में बोलो---
खुद को खुद से खोलो
संकल्प का दीपक लेकर
चेतना को झकझोरो, जगाओ___

मैं पीड़ित__ 
स्वयं को पीड़ा से सिंचता,   
आर्त पुकार करता हूँ। 
अपने दाना-पानी के लिए, 
अपने गौरव के लिए कहाँ जाऊँ? 
उसे कहाँ ढूँढू, 
जो मुझे मेरे जीवन का विस्तार बताएगा। 

अपनी ही उदासीनता से चौंकता हूँ। 
विक्षिप्त्ता में चीखता हूँ। 
नित्य उपजते पैचासिक कोलाहल से भांगू  तो कब तक! 
अंततः अपने क्षत-विक्षत होते जीवन की 
खुद ही हत्या कर देता हूँ। 

जीने की परिभाषा और दुनिया के बवाल से अलग 
अपने ही फ़िक्र में उलझा हूँ.....! 

अधिकार माँगती__
अपने आवाज को बुलंद करती भीड़ 
मेरे ही निकम्मेपन की देहरी पर दौड़ी चली आ रही है। 

आसमान का सूरज मुझे उकसा रहा है। 
जलो, तपो और जीवन के परिधि पर 
पूरे दिलेरी के साथ अस्त हो जाओ। 
कल के स्वर्णिम सुवह के लिए...!
•••


एक नई सदी की खोज

असह्य पीड़ा की दास्तान है मेरा संघर्ष
जिसके स्वप्न में कितनी ही दुश्चिन्ताएं
यात्रा करती है निरंतर

थकान के रोमाँचक मार्ग में
एक विराम का शिलान्यास होता है
एक रिक्त जिजीविषा के बंजर पर
उदासी का स्वागत करता हूँ

जिसके पार जाने की
एक नीरव विकलता लिए
अनगढ़ स्मृति में सिमट जाता हूँ

संचार के चमक दमक से
पोषित-पल्लवित वर्तमान के आकाश में
अपना कोई अर्थ नहीं दे पाता हूँ
न निरर्थक रह पाता हूँ

निरर्थक होना वास्तव में
सार्थकता की पराजय नहीं है

श्रम-साध्य के मिश्रित स्वर में
जहाँ किसी प्रस्थान को
नहीं करता हूँ विदा__

तुम्हारी लगन की उदारता इतना सौम्य
इतना उर्वर है कि__
समय का सरोवर अचंभित है
मेरी अधीरता में इतना खरोंच कि
उसके रुदन से जार-जार होती मेरी आँखें
निर्माण के शिल्प पर भ्रमित है

इस बिखरते समय में
सामर्थ को भ्रम से सींचकर
वितान घेरता रहा
तरुण बिंदुओं को
टेरता है

हमारा कठोर परिश्रम
एक उदीयमान नींव है
वह सारे काम
विश्व परिधि को पाट देगी

हमारी भावी पीढ़ियों
तुम्हें एक नई सदी की खोज करना है
विस्थापन से सम्पूर्ण यात्रा
अविस्मरणीय बनाना है
•••


 ...क्रांति! तुममें कितनी चिंगारी है?


शब्द! शब्द!! शब्द!!!
शब्दों के अथाह समुद्र में
कविताएँ अपना मार्ग तलाश रही है
इतिहास हँस रहा है
असहमति ललकार रहा है
...क्रांति तुममें कितनी चिंगारी है?
ये लोग पागल तो नहीं है

मार्ग पर बिखरा है, दहशत
बिलखती पीड़ा की गूँज
अपनी दीनता पर सिर धुनने
शोषण की दबी चीख पर
मुंह आवाज खोजता है
इन सभी पर किसकी सत्ता है

इस जहरीले मौसम में
कहीं बारूद की महक है
षड्यंत्र की फुसफुसाहट है
सुवह की बेला में विभोर मन
प्रतीक्षा, मधुर पक्षियों के गान की

यह दुर्दशा, पीड़ा, हाताशा
इसका वर्णन कहाँ
किस संस्मरण में
हाँ यह उर्वरता की तरह 
आनवाले समय में
इतिहास को अर्थ देगा 
त्याग का वैभव लिखेगा
•••

रूपक

समय की चकाचौंध में
तुम जो देखते हो
स्याह अनहरिया में
मीट जाता है उसका वजूद
और पीछे प्रकाश में नहा उठता है
उसकी कायर पवित्रता

इस स्वप्निल रात में
सच अपना माथा पीट रहा है
झूठ की देहरी पर
नाजुक कोमलता
अपने रुपक बदल रही है

इंसान और शैतान में
अब फर्क करना है है
रेंगते जा रहे हैं लोग
सभ्यता की पताका तरबतर है
छल के जहरीले पानी से

शोर बढ़ता जा रहा हूँ
चीख और डरावनी हो रही है
इधर__
अन्याय का तिलक हो रहा है
•••

खेत में बिखर जाता हूँ


प्रभात की पहली किरणें मुझे जगाती है
मैं जगाता हूँ अपने बिखरे हुए श्रम को
पैरों में फ़टी विवाईया और अलसाए हुए गम को
जोगाता हूँ माटी और भोथरी धार कुदाल को
और पुरे मशक्कत से लड़ता हूँ

हाँफते हुए, काँपते हुए,पसीने से नहाता हूँ
टप-टप लहु बहाते हुए
बंजर से टकराता हूँ
मैं आग को फूँक मारकर सुलगाता हूँ
उसके राख बनने तक देह को तपाता हूँ
तड़पाता हूँ, थक कर आघाता हूँ

भूख से बिलबिलाते अतड़ियों को
शोक को फटकारते हुए
रोग को रीरियाता हूँ
दुःख के घने अंधेरे को चेताते
अपनी दीनता को गरियाता हूँ
मैं लड़ता-झगड़ता, तपता सुलगता
अंत में खेत में बिखर जाता हूँ
      *****

विकटोरिया पैलेस की मैं


विकटोरिया पैलेश की तरह
मैं संरक्षित कर रहा हूँ शब्दों को
जो बीजों को पालेंगे
मिट्टी को नमी देंगे
हवा को बे रोक-टोक बहाएंगे
मेरे खेतों को बचाएँगे

दुबों पर झिलमिलाते
ओस की दुर्लभ मोतियों के बनिस्पत
क्या है कोई बेशकीमती मोती
दुनिया के किसी संग्रहालय में
इसीलिए मैं मेड को बचाऊंगा
जब सांय-सांय करने लगे रात का अनहरिया
खूब डरावनी लगने लगे झींगुर की बोली
कुत्तों का भौंकना खौफ भर दे पसलियों में
मैं राजघराने की मशाल की भाँति
खेतों में लठ जलाऊँगा

जब नीलगाय रौंदने आएँगे फ़सलों को
सियार लगातार रोयेंगे
मैं जोर-जोर से चिल्लाऊँगा
धक-धक करते कलेज़े से दहाड़ूँगा
बिजूका बनाकर खेतों में
लाल पताका लगाऊँगा
कांटेदार बेल से घेराव बनाऊँगा

जब महानगरों में राशन की किल्लत होगी
रोटी और पानी के लिए झगड़े होंगे
जब स्वार्थ और धन के लिए युद्ध होगा
भूख के लिए हाहाकार मचेगा
मैं अपने खेत की पहरेदारी करूँगा
मैं अपने शब्दों की मिट्टी लेकर
अपने हिस्से का जमीन जोतूंगा
कि हमारी पसलियों को मिले रुधिर
श्रम के हिस्से का भूख

भूख को रोटी से तौलूंगा
मैं बीज को रोपकर पेड़ उगाऊँगा

अरहर, ज्वार, बाजरा छिटकर मेड बचाऊंगा
कोई ताज़ बचाएगा, कोई सल्लतनत
मैं अपना देह नापकर
पोर-पोर ऊर्जा को खपाकर
अपना खेत बचाऊंगा
मैं खुरपी और कुदाल बचाकर
सारा देश बचाऊंगा

मैं एक बीज रोपूँगा
उम्मीद का, सृजन का, परिवर्तन का, क्रांति का
अंत मे असीमित प्रेम का
प्रेम का बीज आँखों में पनपेंगे
संघर्ष का आँसू रोयेंगे
         *****


परिश्रम


तुम खेतों में मेहनत करते हो
तुम जो पसीना बहाते हो
तुम  फ़सल उगाकर दांव गवाते हो
तुम जानते क्या हो?

कौन सा शब्द अधिक अर्थवान है इस दुनिया में
कौन सी कला अद्वितीय है विश्व में
कौन सी कविता सबसे सुंदर है?

चौंको मत
अपने खेतों में लहलहाते फ़सलों को देखो
उसकी समीक्षा करते शब्दों को  ढूंढो
ढूंढो और अनुभव करो
अनुभव करो और विचार करो

खेती के शब्द, श्रमिक हथियार
श्रम की कविता
फ़सल बोने से उगाने तक की यात्रा
जीवन के सुख-दुःख के थपेड़ों को सहते
अपने वाजीव हक के लिए लड़ते
जब एक दिन शुक्रिया जीवन
अलविदा दुनिया कहेंगे

तुम्हारे पास क्या बचा रह जाएगा
तुम्हारे साथ कौन कहाँ जाएगा?
श्रम से बने मकान, शस्त्र कुदाल
दुनिया के सारे उपकरण फेल हो जाएँगे एक दिन
तब भी बचा रह जाएगा
खुरपी, फावड़ा, कुदाल
        ---------


ईमानदारी

जीतना एक स्वप्न है
जबकि हारना
नित्य दिनचर्चा में शामिल 

झूठ के विरुद्ध शब्द
कितनी तापों से झूलसती
ईर्ष्या की आग में तपति
धरती के गर्भ से फूटती
कुंदन हो जाती है

ईमानदारी जीत की कविता है
समर्पण और संकल्प उनके  विश्वास
बंधु, मुझे बताओ मै कितना ईमानदार हूँ
•••

















पीड़ाओं का रेगिस्तान है मेरा गाँव


प्रिय मित्र!
तुम्हारा स्नेह निमंत्रण सराहनीय है अनुकरणीय है
हमसे यह उम्मीद कि
मै उत्सव में शामिल रहूँगा, स्वागतयोग है
शुक्रिया, पर क्षमा करना
मेरी अक्षमता है मै कोई कविता पाठ  करने नहीं आ सकूँगा

ऐसी कोई खास आफत विपत नहीं है 
बस एक बहुत ही जीवन को विचलित कर देनेवाली 
टीस उभरा हुआ है
इस समय  मै, एक बहुत ही जरूरी विरोध प्रदर्शन का हिस्सा बनने जा रहा हूँ

अगड़े-पिछडों में एक घमासन है 
अगड़ा हक हकीकत सबकुछ छीनने को बेचैन है
पिछड़ा अपनी घिनौनी मानसिकता लेकर रोने को लाचार
खुलकर बोलने में प्रतिबंध है 
विचारों पर पहरा है, 
अधिकारों पर सडयंत्र रचा जा रहा है
मै, मेरा कवि उन सभी पुरातन नियमों से असहमत हूँ
कि अपने ही देश में खानाबदोष कि जिंदगी जी रहे हैं लोग
मेरे पाठकों, बंधुओं, मेहनती लोगों से पहचान तलाशी जा रही है

सनातन धर्म मानने वाले
घृणित संस्कृति को जानने वाले
पूछ रहे हैं जाति
कुतर्कों की चाल में पूछ रहे हैं खानदान
मै उसके विरोध में खड़ा हूँ
अराजकता के निष्ठूर काँटों पर पड़ा हूँ

मेरे गाँव का एक खुशहाल किसान
जिसके जवान बेटे को नक्सली बताकर हत्या कर दिया गया
मै उसके लिए विरोध प्रदर्शन कर रहा हूँ

मुहल्ले के एक पिछड़ी जाति के छोरी को 
दवंगो ने स्तन काट दिया 
इसलिए कि वह उनके खेतों में साग खोट रही थी 
मै उसके लिए विरोध में जा रहा हूँ

मेरा एक चिर प्रतिद्वंदी है
जिसे कारागार में बंदी बनाकर कठोर यातना दिया जा रहा है
उसने एक समाजवादी नेता के 
घिनौने चरित्र को उजागर करने का दुःसाहस किया था

पेट की भूख इंसान को बावला बना देती है
और, स्वार्थ की लालसा, एक खूँखार कमीना
यह विरोधों को चिंगारी देने का समय है
और कविताओं में हुंकार भरने का
धूप से तपति हुई धरती 
एक मजदूर के फेफड़े को जला देती है
यह विचारों को धारदार बनाने का समय है

पेट की आग से लड़ता हुआ इंसान 
भीड़ में भिखारी बन जाता है
और ईंट गारे से बने महल की घृणा 
इन्हे समाज के लिए कोढ बताती है
मै चाहता हूँ जब मै विरोध प्रदर्शन में हूँ 
मेरी कविता सच की गवाही दे और
शहादतों के पक्ष में बिगुल फूंके
अपने पूर्वजों के हक में गौरव का गीत गाए

इसी जरूरी समय में न्याय को मनुष्यता के हक में 
रक्तदान करने की वकालत करता हूँ 
चाहता हूँ सौरमंडल के इस एकलौते ग्रह पर मानव के आदिम सभ्यता के हक में फैसला हो
चाहता हूँ मेरी कविता अपनी उपस्थिति की कीमत चुकाए
तब आपके दम्भ से सजे मंच पर विस्मरणीयता के स्वार्थ में असाधारण कविता की पंक्तियाँ बोलना
बहुत ही उबाऊ और निरर्थक और घटिया किस्म की जान पड़ेगी दोस्त
आपके स्नेह में सिक्कों की खनखनाहट है

पीड़ाओं का रेगिस्तान है मेरा गाँव, 
मेरे मुहल्ले में दुःखी काका पुस्तैनी किसान थे
कहने को किसानी करते
रक्त-पसीने से सींच कर फ़सल उगाते
उनके अथक परिश्रम से पंडित साहूकर आघते
लेकिन कभी भरपेट अन्न नहीं खाते
तंत्र के छल की बाँसूरी पर वे नसीब को कोसते
रीरीयाते घिघीयाते, पीड़ा के गीत गाते

सता की नालायकी ने कभी उनके लहलहाते फ़सल की कीमत तो नहीं चुकाया
लेकिन मौत ने उनकी बिछुड़ी हुई हड्डियों पर ऐसा जश्न मनाया
कि बादल भी गला फाड़ कर रो पड़ा
कीचड में सने उनकी लाश को कफ़न कौन दे 
भूख से तड़पती उनकी सात साल कि बच्ची को पिता की लाश पर चीख-चीखकर मरते पुरा आकाश देखा है दोस्त
इंसान के गाढ़ी खुन के साथ इससे घिनौना छल क्या हो सकता है

पुराणों के पवित्र श्लोकों के विपरीत एक ईमानदार संघर्ष होती है, उम्मीद की हूक होती है
मेरे विरोध प्रदर्शन, मेरे कवि के सत्य समर्पण को
सता का धारदार छुरा सीने में पेवस्त न कर दे
इससे पहले मुझे शांति जुलूस में जाना होगा
मै उस हर प्रदर्शन में जा रहा हूँ जहाँ मलीन बस्तियों का शरीर
लाठी का प्रहार झेलते खेत हो जा रहा है
जहाँ उनके मांस के लोथड़े हवा में लहराते रेत हो जा रहा है
एक कवि ने अपनी महान कविता में कहा था
इंसान हर रस और श्रृंगार की कविता से बड़ा है
इसी कारण तो वह शताब्दियों से खड़ा है

दोस्त यही समय है, मै अपनी कविता के साथ
रेगिस्तान में तप जाऊँ
खेतों में गड़ जाऊँ
बंजरों में तन जाऊँ
अपने कवि को लेकर राजमार्ग पर गड़े कीलों पर चलूँ और सत्ता के हुक्मरानों से लड़ जाऊँ
जीत की गुहार पर सौ सौ बार मर जाऊँ।

~ सुरेन्द्र प्रजापति
   21/11/2023


लौटती हुई औरतें


अब नदियों ने 
बदल दिया है अपना रास्ता
अब उसमें वो शक्ति नहीं
जो मिट्टी को संजीवनी दे सके
आपने सीने पर ढो सके उर्वरता

बंजरो में लड़खड़ाती हुई नदी
बर्फ़ नहाई प्रभात को
अपनी भाषा के शब्दकोष में दर्ज कर रही है
और समय की सबसे कोमल कविता
कठोर चट्टानों से टकराकर चूर-चूर हो बिखर रही है
























सूरज की किरणों में
अब कैद नहीं रही रुमानियत
न बैलों के गले में घंटी की आवाज
न पतियों में वृक्षों का बचपन
न फूलों से सुरभित मन
मिट्टी अब नहीं ढोती वृक्षों का भार

स्त्रियाँ अपने हाथों से 
समय की कठोर परतों को
कुरेद रही है और सी रही है
उसके नाजुक तन ने
सिख ली है समय की ताप पर तपना
जीवन के समतल पर
उकेर रही है पावों की अक्षरमालाएँ

कई-कई हाथ, कई संवाद मिलकर
बना रही है, संघर्ष की कलाकृति
अनगढ़ शिल्प
रच रही है जीवन की कविता
और कविता रच रही है
स्त्रियों के मौन संघर्ष को
जो कैद है परम्परा की दिवारों में

काम से लौटती हुई स्त्रियाँ
टकटकी लगाकर
अपने पैरों की फ़टी विवाई को देखती है
देखती है बदशक्ल नाखुनों जो
उलझी हुई सिसकती लटो को
अंगूठे का निशान पत्थरों पर निहारती है
देखती है तपति धरती पर फ़टी हुई सुस्ख दरारों को

धरती और आसमान के बीच से
एक टुकड़ा आकाश
सहेजती है स्त्रियाँ धैर्य को रांधती है
जहाँ एक नन्हें पौधे के साथ
दुब के समानांतर सपने उग आए हैं

अनंत सपनों में जीती 
संभावनाओं में जागती
स्मृति के दर्पण में
अपने गाढ़े दिन को सजा रही है स्त्रियाँ

फिसलते समय को 
गीली मिट्टी की तरह गूंथती
अपने हाथों में पुरुषवाद का महावर
गोबर से पोत ली है स्त्रियाँ
•••

~ सुरेन्द्र प्रजापति
     30/11/2023


अक्रोश



होने नहीं होने के इस संभावित समय में
टूटते स्वर और स्वरविहीन होने के विस्मय में
बर्बरता के निर्माण और प्राप्त के विध्वंश के भय में
ये कैसी परिभाषा आवा-जाही कर रही है

समय है विघ्नों, संकटों के फुसलाए जाने एक
छल के जंकल्याणकारी योजनाओं से बहलाए जाने का
हमारी सहमति का  व्याकरण खंड-खंड जल रहा है
क्या हमारे अस्तित्व में कोई दावानल पल रहा है?

मैं पूछ रहा हूँ विश्व संस्कृति से, 
मैं पूछ रहा हूँ संयोगे हुए स्मृति से 
मैं पूछ रहा हूँ स्मृति चिन्हों से अविष्कार के देवता से
मैं पूछ रहा हूँ आखिरी संघर्ष से आत्मा के बिलखते विमर्श से
मैं पूछ रहा हूँ और धमाकों में तब्दील कर दिया जा रहा हूँ

मेरे खून से सने मांस लोथड़े, जो श्रम से बेजार थे
मेरे मनुष्य होने की गवाही के पक्ष में कौन तलबगार थे
कितनी सामत, कितनी नफ़रत 
कितने-कितने षड्यंत्र का शिकार हूँ 
अपनों की नजरों में संदिग्ध हूँ, बेजार हूँ
मेरी मौन सवीकृति मुझे अंधेरे में दफन कर रही है
कुछ भी नहीं बोलने की प्रवृत्ति मुझी को जकड़ रही है

प्रत्येक मार्ग पर अंतहीन अंधेरा फैला है
पगडण्डियाँ जिस पर कंटक खिला है

विपन्नता की धूल में लिपटे हम भटक रहे लोग
शब्द कोई विन्यास नहीं वरण शिकार कर रहे हैं

कुछ बिछुड़ा हुआ लेकिन मिलने की आतुरता नहीं
मुरझाया हुआ लेकिन पुनः खिलने की उत्सुकता नहीं
सच जानने के बावजूद जाहिर करने की आवश्यता नहीं
कोई भटका हुआ पर उसके पुनः वापसी की प्रतीक्षा नहीं है

क्या यह अकस्मात है?
हम किसका शिकार हैं?
हमें अचानक यातनाएँ घेर रही है

अब सरलता किसी को लुभाता नहीं
उग्र होने के लिए उकसाता है
शान्ति किसी को लोरी नहीं  सुनाता 
वर्चस्व के लिए ललकारता है
सुंदरता हवस की चाशनी  में घेर रही है

उजाले को टुकड़ों में तोड़कर
उसके एक-एक फाँक को अंधेरे में सुलाया जा रहा है
जैसे वृक्ष की पतियाँ चरमराती है
समय चरमरा रहा है
कब गिरकर बिखर रहे हैं

अतीत का टापता हुआ वैभव
ध्वंस का अभ्यारण्य बन गया है
वर्तमान से मवाद की तरह बहता हुआ
ईर्ष्या की अग्नि में तप रहे हैं

यहाँ स्वप्न है
उम्मीद है
श्रम की ललक है
पर जीवन नहीं है, 
है तो...यौवन नहीं है
चमकदार सपने हैं, 
लेकिन लीलता हुआ, 
जमींदोज करता हुआ
दुर्भाग्य कि सभी मेरे अपने हैं

हम पहचान भूल रहे हैं
हम शिल्प को भूल रहे हैं
हम अक्षरों को भूल रहे हैं
हम, हमीं को भूल रहे हैं
हम, हमीं को कत्ल कर रहे हैं
°°°°°    3 जनवरी 2024



कल
 •••••

अलसाई हुई शाम की आँख में
थकान के विम्ब डोलते हैं
शिराओं में उमगा हुआ टूटन
नींद से संवाद करता है

ऊंघटी हुई पहाड़ी के मार्ग में
चरवाहों की टोलियाँ 
गीतों को उछालता है गाँव तक

मेरा स्वप्न राख हो रहा है
बसंत के अंचल में हाहाकार  है
जो मिटा दिया है हृदय का चिह्न

मायूसी फूलों में घुलकर
उड़ा दिए है रंग
भीनी-भीनी महक पर आक्रमण हुआ है
बहुत थोड़ी सी आश खरीदने के लिए
मन भर प्यास की मृत्यु हो जाती है

देखो! हजार पृथ्वियाँ कैद है
मेरे चुटकी भर उम्मीद में
अतीत वर्तमान को सींचता है

सत्ता से छला गया किसान
बंजर पर आक्रोश बोता है
घरती के गर्भ से निकला अनाज
अब भूख नहीं मिटाता
बल्कि बर्चस्व की प्यास बढ़ा देता है

पेट को अब अन्न नहीं
अहम का पारितोष चाहिए
खुलकर बोलने की और
अपने होने का संतोष चाहिए
°°°°°
3 जनवरी 2024




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