{सुरेन्द्र प्रजापति की कविताएं }
आप याद आए
मुझे अचानक आप याद आए
सोचा सम्पर्क कर लूँ
अपने लिए अर्जित कर लूँ
थोड़ी सी शुभकामनाएं
मैं कांपते हाथों से फोन मिलाता
मोबाइल की हर घण्टी के साथ
कौतूहलता के साथ थोड़ा सकपकाया
लेकिन आपके आत्मीय संवादो ने
मुझे ढांढस बंधाया
पूछने पर मैं नाम बताया, गाँव बताया,
कविता का संदर्भ दिया
आपने कहा- 'कविताएँ अच्छी है'
कि- 'लिखते सीखते रहिए'
कि- 'अध्ययन करते रहिए'
साहित्य के भंडार का
जीवन के विस्तार का
कि धीरे-धीरे कविता तय करेगी रास्ता
खोज लेगी अपना उर्वर प्रदेश
सौंदय के विस्तृत प्रसार का
आपका संवाद मुझे संजीवनी दिया
थोड़ा प्यासा था, घूंट-घूंट पिया
आज मैं सोचता हूँ
कविता, कविता बन जाती है
समय के बदलाव के साथ
तो इंसान, इंसान क्यों नहीं बनता
जबकि रोज हजारो कदम चलता है
क्या मार्ग में स्वयं को छलता है
प्रतिउत्तर की उम्मीद में
भौंहे तन जाती है,
एक खिंचाव आ जाता है नस-नस में
आत्मा से ही एक युद्ध ठन जाती है
माँ का अंश (भष्म)
मैं माँ का भष्म लेकर
एक माँ(गंगा) के निर्मल गोद में खड़ा
शीतल लहरों को देख रहा हूँ
आज तरंगे
कितनी शांत है
वैसे ही माँ का अंश
अनायास मेरी आँखें नम हुई
उस नमी में एक प्रार्थना
उस प्रार्थना में ममता की स्मृति
मेरे कण-कण में रहेगी
करुणा बनकर बहेगी
मुझे स्मरण कराएगी निरन्तर
एक दिन-
मुझे भी आना होगा राख बनकर
बसंत
होठों से फिसलती हुई मुस्कुराहट
बाँसुरी की स्वर लहरियों पर लौट रही है
कल्पनाओं के निर्मल धुन पर
स्वप्नों की रेशमी डोर थामे
आह्लादित है हर दिशाएँ
थकान की पीड़ा गा रही है
चंचल हृदय की कामनाएं
हर सुख अल्हड़पन की मस्ती है
साध की ऊष्मा सुभाषित है
कोमल हुई है, मौन की कठोरताएँ
हर तरफ उल्लास की बोली लगी है
पराग में भंवर की है, उतेजनाएं
नव जीवन के संचार में
उत्सव की लहरियों के व्यार में
नव प्राण का, नव उम्मीद की
यह अरुणाभ पहर में
सुगबुगा रही है संवेदनाए
ओ! गीत
नव लय में, मृदुल प्रणय में
धरा को सजाओ, क्षितिज को झुकाओ
शब्द के सारांश में है प्रेरणाएं
ओ मलय पवन! नई शुरुआत करो
इस मर्मर कानन में स्वर्ग धरो
स्वप्नों की राग में, हुलस गया है विविध चित्र
ठहराव, से निकल
संगीतमय तार में
आकर्षण के व्यापार में
मुझे ले चलो! मुझे ले चलो!!
स्पर्श
जिस कोमलता से
स्पर्श करती हो तुम
चाँदनी भी उसी सहजता से
छुती है तुम्हारी देह
जैसे घास की फुनगी छुती है मेह
वायु तुम्हारे साँस से गुजरती है
जैसे अंतर की ध्वनि बजती है
सौंदर्य की अनुभूती करती कविता
करती है युगों से नेह
बुलडोजर
रो रहा है इंसानियत
हैवानियत हँस रहा
क्रूरता को अंजाम देने
विस्थापन का नाम देने
एक सनकी निजाम देने
ध्वंश हिंसा का नाम देने
काँप रहा घृणा धर-थर
भयभीत नेत्र का स्वप्न मर मर
लाचार बधीर भी चीख रहा है
चिंघाड़ रहा है बुलडोजर
उम्मीद
जब मेरी अंतस की वेदना
व्याकूलता में बिलखने लगे
पीड़ा में चटखने लगे
यातना में बिखरने लगे
तब मैं उम्मीद को जगाऊँगा
बूँद की शीतलता लेकर
भूख को सुलाऊँगा।
नियति
उस समय प्रत्येक शब्द मौन था
जब बोलना जरूरी था, और
सच की खिल्ली उड़ाई जा रही थी
जब झूठ की आरती उतारी जा रही थी
बताओ भाई, वह नियति कौन था
बीज बोना
प्रेम के अल्फाजों को
स्वच्छ बादलों में पिरोना
जहाज से सौगात ढोना है
समंदर का संगीत
तरंगों का उन्मत्त गीत
एकाग्रचित भाव से देखना
कोमल पंक्तियों को चुनना
नई सृजन का बीज बोना है
अपील
उसका अपील
छल की स्याही से लिखा गया है
जबकि मेरा अपील पीड़ा की आँसू से
उसका अपील
धूर्तता के गिनियों के साथ
पेश किया जाता है
मेरा अपील याचना में डूबे दुःख के साथ
उसका अपील
सत्ता के आदेश की तरह पढ़ा जाता है
जबकि मेरा अपील हिकारत से देखकर
डाल दिया जाता है कूड़ेदान में
क्या फर्क पड़ता है?
बेचारी किस्मत के व्यवधान में
अब मै भी कैसी बेतुकी बातें करता हूँ
स्वर्ग कभी मिला है नर्क से
कब आसमाँ धरती से मिलने को आतुर हुआ
कभी प्रेमालाप नहीं किया पाप और पुण्य
न विचार एक हुआ देवता और दानव का
रिक्त स्थान
मैं उन दिनों उल्लास से देखा था
जब तुम देहरी पर
अपनी चंचलता बिखेर रही थी
हवा की धीमी बहाव में
बहा रही थी शोखीपन को
आँखों में इंद्रधनुषी तरलता थी
और पैरों में स्वछंद उड़ान
आज मैं भावहीन कौतुहलता से
देख रहा हूँ
उस रिक्त स्थान को
परम्परा की ढलान को
मेरा उल्लास मृतकाय
शोकगीत गा रही है
तुम्हारी अनुपस्थिति से
उत्पन्न उदासी,
अनंत पीड़ा में नहा रही है।
जीवन गुजर जाता है
एक सुवह आने के बाद
यह निश्चय करना कि
दुनिया सुखों का पिटारा है
अगली सुबह का इंतजार करते हैं
जिन्दगी भर
जीवन-पथ पर चलते हुए
अचानक प्रतिरोध आया
विपतियों का पहाड़ टूट पड़ा
उस वक्त यह निश्चय करना कि
जिन्दगी दुःखों का समुद्र है
जीवन गुजर जाता है।
~सुरेन्द्र प्रजापति
