माँ का अंश (भस्म)


 {सुरेन्द्र प्रजापति की कविताएं }


आप याद आए

मुझे अचानक आप याद आए
सोचा सम्पर्क कर लूँ
अपने लिए अर्जित कर लूँ
थोड़ी सी शुभकामनाएं

मैं कांपते हाथों से फोन मिलाता 
मोबाइल की हर घण्टी के  साथ
कौतूहलता के साथ थोड़ा सकपकाया
लेकिन आपके आत्मीय संवादो ने
मुझे ढांढस बंधाया

पूछने पर मैं नाम बताया, गाँव बताया,
कविता का संदर्भ दिया

आपने कहा- 'कविताएँ अच्छी है'
कि- 'लिखते सीखते रहिए'
कि- 'अध्ययन करते रहिए'
साहित्य के भंडार का
जीवन के विस्तार का
कि धीरे-धीरे कविता तय करेगी रास्ता
खोज लेगी अपना उर्वर प्रदेश
सौंदय के विस्तृत प्रसार का

आपका संवाद मुझे संजीवनी दिया
थोड़ा प्यासा था, घूंट-घूंट पिया

आज मैं सोचता हूँ
कविता, कविता बन जाती है
समय के बदलाव के साथ
तो इंसान, इंसान क्यों नहीं बनता
जबकि रोज हजारो कदम चलता है
क्या मार्ग में स्वयं को छलता है
प्रतिउत्तर की उम्मीद में
भौंहे तन जाती है,
एक खिंचाव आ जाता है नस-नस में
आत्मा से ही एक युद्ध ठन जाती है 

          


माँ का अंश (भष्म)


मैं माँ का भष्म लेकर
एक माँ(गंगा) के निर्मल गोद में खड़ा
शीतल लहरों को देख रहा हूँ

आज तरंगे
कितनी शांत है
वैसे ही माँ का अंश

अनायास मेरी आँखें नम हुई
उस नमी में एक प्रार्थना
उस प्रार्थना में ममता की स्मृति
मेरे कण-कण में रहेगी
करुणा बनकर बहेगी

मुझे स्मरण कराएगी निरन्तर
एक दिन-
मुझे भी आना होगा राख बनकर

                   


बसंत


होठों से फिसलती हुई मुस्कुराहट
बाँसुरी की स्वर लहरियों पर लौट रही है

कल्पनाओं के निर्मल धुन पर
स्वप्नों की रेशमी डोर थामे
आह्लादित है हर दिशाएँ

थकान की पीड़ा गा रही है
चंचल हृदय की कामनाएं
हर सुख अल्हड़पन की मस्ती है
साध की ऊष्मा सुभाषित है
कोमल हुई है, मौन की कठोरताएँ
हर तरफ उल्लास की बोली लगी है
पराग में भंवर की है, उतेजनाएं

नव जीवन के संचार में
उत्सव की लहरियों के व्यार में
नव प्राण का, नव उम्मीद की
यह अरुणाभ पहर में
सुगबुगा रही है संवेदनाए

ओ! गीत
नव लय में, मृदुल प्रणय में
धरा को सजाओ, क्षितिज को झुकाओ
शब्द  के सारांश में है प्रेरणाएं

ओ मलय पवन! नई शुरुआत करो
इस मर्मर कानन में स्वर्ग धरो
स्वप्नों की राग में, हुलस गया है विविध चित्र

ठहराव, से  निकल
संगीतमय तार में
आकर्षण के व्यापार में

मुझे ले चलो! मुझे ले चलो!!                     



हम मरकर भी जी उठेंगे बार-बार


जो दीन-हीन-मलीन हैं
जिसके स्पर्श से
वस्तु, स्थान, घटनाएँ
अमंगल हो जाती है, 
उसकी शुद्धता गंगाजल से 
या मंत्रोचार से पवित्र की जाती है
निहायत ही वह इंसान नहीं हो सकता
बल्कि समय के सरोवर में
भिन्नाता एक घटिया वस्तु है।

हाँ! बर्बरता के चाबुक से पीटता
एक चीखता, चिल्लाता जीव
भोग के इस्तेमाल के लिए
एक नियत दिनचर्चा
उसके सरोकार और अधिकार को किसने
और किस काल में समझा गया
जबकि, घृणा और तिरस्कार ही उसका वाहक है।

कहते हैं, प्रेम बचेंगे, संबंध बचेंगे, 
तभी जीवन बचेंगे,
इंसानियत के फुल खिलेंगे, 
लेकिन ये स्वर्ण और अवर्ण की नस्लें
कभी संबंधों का पुल बनने दिया?
आदिकाल से आजतक।

घुड़की, थप्पड़, चीखती हुई गालियाँ तो नश्तर है
कुतर्कों की चाशनी में डुबोया हुआ, बुझा हुआ तीर
और उसे बेहयाई से बरसाता हुआ सभ्य समाज
संस्कृति के अमर धागे को चटकाती
गाती रही प्रार्थनाएँ और फेकती रही
बेहयाई का खंजर।

स्वप्न उसका भी था संबंधों को प्रगाढ़ बनाना
लेकिन तुम्हारे नियति में है जूठन खाना
अंतस की दुखती रगों में
चुभती हुई बेशर्म नजरों का डर नहीं है
बल्कि भूख की एक असह्य पीड़ा है
छल से फेंके गए भाले को झेलता
निश्चय ही वह एक असभ्य क्रीड़ा है।

स्मृति में बेगार ढोते, करुणा का फंदा है
शरीर रेगनी के अनगिनत कांटों से बिंधे हुए
सहमे विचारों में, जलती हुई धरती
जिसपर चलते हुए पाँव में फफोले पड़े हैं

रोना, कलपना, गिड़गिड़ाना
बेजान शरीर को लहराना
हमारा यथार्थ है, 
मृतकाय जीवन की अभिव्यक्ति
काँटों पर मुसक बाँध कर सुलाया जाना
तिसपर फोकस करती ढीठ आँखें
हमारी याचना की दम तोड़ती शक्ति है।

तुम्हारा तर्क है, हमें जीने नहीं दोगे
हम मरकर भी जी उठेंगे बार-बार
सामना करेंगे तुम्हारा
हर अमानुषिक प्रहार।

   



मेरी पूजा से छुटहि पाप क्यों...


पवित्र कहे जाने वाले श्लोक की भाषा
उसके घिनौने लगने वाले तर्कों का
कभी कोई मेल नहीं हुआ 
जिसके लिए मनुस्मृति का मंत्र सुनना पाप है

उसने कहा और बार-बार घृणा किया
कि पूर्व जन्म का कुकर्म ही
इस जन्म में तुम्हे नीच कुल का बनाया
और पापी पेट मे पैदा हुआ
गंदी गालियों का नश्तर झेला

अब क्षुद्र हो तो, देवता का अपमान न करो
पतित हो तो देवी का गुणगान न करो

तुम्हारे लिए नर्क ही श्रेयकर है
दलित पैरों से परिसर को मत रौंदो
तुम्हारे जिंदगी में अभिशाप ही बेहतर है

वह बेगार ढोता हुआ
अपनी पीठ पर ग्लानि के
चुभोये गये बिभत्स पीड़ा
गाली-ग्लौज के बहते सदांध को
झेलता, संवेदना को तलाशता
खुद से घृणा करता, अपनों से भागता
जब-तब चौंकता है।

कि मेरा संघर्ष मंदिर की भव्यता है
कला की समृद्धि है
तो मेरी पुजा से छुतहि पाप क्यों?
बताओ, सत्ता पर आसीन आकाओं




वफ़ादार कुत्ता

                    

वफादार, हां 
ओ वफादार कुत्ते
तुमने अपने मालिक से
इतने आत्मीयता के साथ
वफादारी करना कहाँ सीखा ?
कैसे जान जाते हो
अजनवियों का गंध
उसका घृणित मन्तव्य

तुमने तो 
किसी पाठशाला में
पढ़ाई नहीं किया
वफादारी का, सुरक्षा का
न ही किसी प्रख्यात विश्वविद्यालय में
डिग्री लिया
कैसे मिट्टी की उष्णता से
जान जाते हो
की धरती के किस टुकड़े में 
किसी निर्बल इंसान का 
लाश दफनाया गया है
कि जमीन के इसी टुकड़े पर
बलात, लूट-खसोट
और खून के छींटे
चमक रहे हैं ।
तुम्हे कैसे मालूम ?

मानव के आदि सहचर
तुम्हारी ज्ञानेन्द्रियाँ
इतनी जागृत क्यों है
मानव का घृणा, दुत्कार, मार
बड़े ही सहज ढंग से
ले लेते हो
मानव की भाषा, करुणा, दया
वर्जित है तुम्हारे लिए
तुम कुशल भेदिए की तरह
पूरी ईमानदारी के साथ
रचे गए साजिश के चक्रव्यूह को
कैसे अकेले ही, पार कर लेते हो
जबकि स्वार्थी जीवधारी
तुम्हारी, सारी क्षमताओं को भूलकर
करता रहता है बार-बार प्रहार
देता है असह्य चोट
देता है गालियाँ
चालाकी ये कि, किसी आलसी
और कमजोर इंसान के साथ
तुम्हारे नाम का कोरस
बड़े ही उदण्डता और घृणा के साथ
ही किया जाता है

वफादार प्राणी
आज तुम्हारे साथ चलने वाले
कोई पांडव नहीं है
न धर्मराज युधिष्ठिर
सिर्फ तुम ही तुम हो
और तुम्हारी वफादारी

                   



हलवाहा


 किसान
अपने बैलों को
हांकता है
जोतता है खेत
अपने परिश्रम की उष्णता
सोंधी मिट्टी में 
मिला रहा है
आपने विश्वास का मोती
बंजर में
उगा रहा है

बरस रहा बरखा
मूसलाधार-
तेज बूंदों की बौछार 
शरीर को भिंगोता
मन को गुदगुदाता
करता है
वारि का प्रहार, प्रकार

चलता हुआ बैल
कंधे को उचकाता
रुक-रुक जाता है
किसान बैल को
दुत्कारते हुए
मारता है पैना
ललकारते हुए
भद्दी सी गाली देता है
फिर कुछ पल रुक कर
पुचकारते हुए
उसके पीठ पर
बड़े आत्मीयता से
फेरता है हाथ

"चल बेटा..आ..
चल..अ हो बाबू
बस, कुछ देर और चल ले
अब क्या है
इंद्र भगवान भी खुश हैं
इस वारिश में 
मजा आ रहा है न...
बड़ी उमस वाली गर्मी था भईया
इस बरस
सोलहो आना धान 
होना तय है " ।

किसान पुनः बैलों को
हांकता, ललकारता
दोनों बैल कंधे को उचकाता
अपनी मौन स्वीकृति देता
पूरे वेग से
हल को खींचता है
किसान पूंछ को सहलाते
दुत्तलि मारते
भींगते वारिश में गुदगुदाते
'वाह, वाह..बेटा
बस हो गया, हो गया'

किसान के मार की भाषा
हाथ का स्पर्श
शायद समझता है बैल
अपने सहचर के
आत्मीय अनुराग को
सिर हिलाकर ही
करता है संवाद

                         

 

सत्यमेव का पताका

                   

खामोशियों के,
कुशल साजिशों से बचो
सम्हालो, अपने होशों हवास को
बढ़ो, जाओ उस मरु भूखण्ड पर
अतीत हो चुके, 
खंडहरों के प्राचीरों पर
ढूंढो, जीवन के विराट गंध
जहां, सत्यमेव का पताका
स्वार्थी आदमखोरों ने
झुका दिया है ।

चीर डालो, 
निराशाओं के घने कोहरे को
क्योंकि-
उसी विटप सघनता में
पुरे ओजों, चंचलता के साथ
आशा की किरण, दामिनी
कौंधने वाली है बंधु

तुम निर्लिप्त, विवशता की 
चाकरी करना छोड़ दो
जो तुम्हे बाँध रखा है
उस बेड़ियों को तोड़ दो

किस्मत का ढिंढोरा मत पीटो
अपने पुरुषार्थ पर
नामर्दी, कापुरुषता के दैत्यों को
हावी मत होने दो
हाहाकार करते पसीने को 
गिरवी मत रखो
ईमानदार हवस की
कलाबाजियों से चौंको मत
तुम, भीषम त्रासदी में भी
कड़वी मुस्कुराहटों का बिगुल फूंको

ओ राष्ट्रनिर्माता, नरेश
दुनियाँ का सारा श्रम
शिल्पों में पिरोया गया
एक एक आश्चर्य
मेंरे हुनर की दास्तान है
अब अपने शिल्प में
एक एक सृजन का
मानचित्र बना रहा हूँ ।


            

एक कविता


"यह जीवन है"
और "यह अर्पण है" के बीच
उर्वर धरती पर
आसमान के नीचे
एक खाली स्थान में
बैठी है कविता

बोलो कवि__
इस मौन के दलदल में
प्रेम की भाषा कैसे जीता?

अदृश्य मार्ग
अपठित शब्द
निरुदेश्य विचार
कितने-कितने शोर में
बचपन कैसे  बीता?

      



दृश्य


हवा जैसे हवा को झुलाती है
पानी, पानी को बुलाता है
छया, छाया को छांव देती है
शिल्प, एक भिन्न शिल्प को जन्म देता है
एक खामोशी, दूसरी खामोशी को रचती है
मैंने देखा है साहब-
यह सब कहीं न कहीं रोज घटता है

         


श्रम की प्रार्थना


सुवह काँपती हुई आ रही है
थरथराती हुई देह
गा रही है
श्रम की प्रार्थना

इस जनतंत्र में
कुछ विशेष संस्मरण लिखे जा रहे हैं
धूर्तता की कलम और छल की स्याही से
इस ठंढ में तंग देह 
अपनी ही भीरुता में 
बिके जा रहे हैं।

          


संवेदना का सूरज आँसू बहा रहा है


गगन में जीवन की कविता उड़ रही है
चकित है मेघों का मियाज
बंजर धरती उत्सव मना रही है
सदी का अंतिम यात्री 
दे रहा है आवाज
विलासिता के शिखर पर, 
सो रहा है ताज

संवेदना का सूरज आँसू बहा रहा है

          


योजना बना है


एक यतीम का दुःख सस्ता है
*एक आलीशान* अट्हास से
एक भूखे पेट का निवाला बहुत महँगा है
सलीब पर टँगे हुए
सदियों से जगे हुए
बिछुड़ी हुई हड्डियों का कोरस गाते
अपने ही संघर्ष से ठगे हुए
अट्टालिकाओं में ईश्वर का वास है
रसीद कटाओ, पावती ले जाओ
संसद भवन में बहस चल रही है,
आश्वासन दे रहा है भाग्य विधाता
महँगाई कमेगी, पहले खामोश हो जाओ
योजना बना है
दुर्दिन में तुम उपवास रखो
वह स्वर्ग सुख में अघाता

              

प्रतीक्षा


सुवह की प्रतीक्षा में,
मैं रात भर जागता रहा!
उम्मीद कांपता रहा!!
स्वप्न भागता रहा!!!

सुवह आई 
पहले मुस्कुराई
फिर भृकुटि फैलाई
और मर गई बुधुआ की माई

धुंधले प्रकाश में
ठंढ झाँकता रहा
देह! गुदड़ी को ढांकता रहा

          


उत्तेजना


भोग तृष्णा के पास
जहां स्वयं खड़ा
पुष्प की कोमलता को घेरे
काले-कलुशित वाण मेरे
भाव रचते शब्द बाधित
चेतना पर
फिर-फिर लज्जित दिन शान्ति
काल की उत्तेजना पर




मौन


एक मौन है
मेरे और तुम्हारे बीच
जो स्नेह से सिक्त है

एक मौन है
मेरे और जीवन के बीच
जो कर्तव्य से रिक्त है

एक मौन है
मेरे और स्वप्न के बीच
जो संस्कार विहीन है

एक मौन है
मेरी आत्मा के बीच
जो स्वयं में अभिसिक्त है

और वे सारे मौन
निःशब्द झर रहे हैं
माटी की उर्बरता खत्म हो रही है




बढ़ो


स्वप्नों के तेज में स्वयं को ढूंढो
प्रकाशित पथ बुला रही है
मिट्टी की ढूंहों कल परकोटे बनेंगे
बढ़ो बोझिल कदमों से
उम्मीद की सीढ़ियाँ चढ़ो




लहूलुहान किरनें


इस कोलहल भीड़ में
खामोश निर्लज सुनी राहें
हर कुतर्क की चालों में
चकित हर पल खुनी आहें
प्रत्येक न्याय से सुबूत मांगता 
युग का अंधेरा

कितनी किरनें लहूलुहान हुई
कितनी प्रभा का अंत हुआ
कितनो को
तम की विभीषिका ने आ घेरा




गरीब शान्ति


सत्ता का संग्राम
स्वार्थ का कोहराम
और यह बदलाव की चमक
कि लज्जित है गरीब शान्ति

ईस उम्मीद से दूर
मेरा स्वप्न बंदी है
विचार को कारावास की बेड़ियाँ
निरंतर पीड़ा ही आवास
मेरी तड़फड़ाती मुक्ति की प्यास




बंदी मुलाक़ात


कतारवद्ध खड़ा मै
टकटकी लगाए 
विशाल लौह दरवाजे को देखता हूँ
उसके खुलते ही कुछ प्रकाश चमका
उस प्रकाश में अनगिनत चेहरे
कुछ में उमंग, कुछ में उत्साह,
कुछ में व्य्था-विनित चित्कार

मैनें उसे देखा
चेहरे पर व्याकुलता
मेरी नजरें फिसलती हुई
उसके आँखों के समंदर में खो गया
आँखों की कातरता, आँसुओं में तैरने लगी
चेहरे पर व्याप्त उदासीनता
होंठों पर आकर ठहर गई
कुछ आँसुओं की बुँदे
मलीन कपोलों पर लुढ़क गए

कंठ से एक टूटती हुई आवाज निकली
"कब आओगे"
और कुछ शब्दों को आँसुओं ने कह दिया
जहाँ दर्द था, पीड़ा की कहानी थी
घर गृहस्थी का बोझ था
जिम्मेवारियों का वचन था

मै निरुतर था क्या कहता
उस गरीब पल में मेरे पास
कोई शब्द शेष न था
जिसे साझा कर
उसके वेदना को कम करता
वैसा कोई अवशेष न था



आशा की किरण फुट रही


जिधर भी दृष्टि डालो
परिस्थितियों की विषमता है
गाओ विभीषिकाओं का कोलहल गान
यह विपदाओं का अभियान

भविष्य निराशा-तम से भरा
रक्तिम-प्रकाश से ताज़ा हरा
सुख की तृष्णा में अशांत
नहीं अब शेष कमलिनी कांत
कवि-कोविद कलाकार
कसो सर्जना का तार
रसवंत सागर से नहाए
करो धुति कृतियों का सत्कार

आग्नेय विनाश के घेरे से
घोर घटा नाश के डेरे से
झाँक रही है अरुणोदय
संभावनाओं का अभ्युदय
आशा की किरण फुट रही
करो-करो सत्कार



किसने देखा उसे


वह रहस्यमयी काली परछाइयाँ 
जो इस प्रतिकूल समय में
काली रजनी के तम को ओढ़े
मौन की दिवार से टकराकर
गिर पड़ी थी
प्रकाश किरणों से छितराकर
सहमी खड़ी थी
किसने देखा उसे?

चाँद की मलिन छाया
चाँदनी की मोह माया
निशाचरों ने गीत गाया
ज्योत्सना में टंगी थी
पलकों पर लुढ़क पड़ी थी
किसने समेटा उसे?

दिप्त तारों से भरा नभ
मेघ पुष्पों से पटा है
इस विषम बेला में
किसने सजाया उसे?

किसने लगाया छलांग आदमकद दुर्लभ दिवारों को
किसने कंकड फेंका यह? 
सलील में असंख्य जुगनुओं के हास भी
भिन्न-भिन्न प्राणियों के परिहास को
कौन जगाया उसे?

मरुलोक के छंद में
बसंत गायन के स्वर गा गई
पुरवाई के कोमल थपेड़ों से
तनमन को महका गई,
ऐसी स्वप्न नींद में
ये माया सिरजती रात
कब ये स्वप्न बदल जाए?
और जागरण का द्वार खुल जाए।




असम्भव बूँद


सुख की कोमल छाया में
जीवन की मोहक माया में
कहाँ वह आनंद? 
जिसे, आत्म रचित छंद में गाया जाए!

नवीन क्रीड़ा की पुनरावृतियों में
सृजन के नवीन परिस्थितियों में
कहाँ वह विनोद?
जिसे प्रभात-किरणों से सजाया जाए!

कौतुक करती आत्मा नभ को ताकती
शरीर सपाट भूमि पर गिरती है
लेकिन कहाँ वह ऊर्जा?
जिसे पुरुषार्थ के साथ गाया जाए?

विपदा के भयानक किनारों पर बैठा मै,
नीलाँचल के सतह पर तैरती
हजार सिपियों को देख रहा हूँ...
बिखर जाने को निमित्त
ये सभी शतरंज पर फेंकी गई गोटियाँ है
जो बटोर ली जाएगी

फिर भी आशान्वित मै
असम्भव बूँद के लिए लालायित हूँ 
जिससे आकाश की नीलिमा नहीं 
धरती के कठोर मरू जी उठे 
उगने लगे दुब-घास।




हताश पीड़ा


मै उदास लहरों को देख रहा था
कुछ पीड़ा, कुछ संताप का आवरण लिए
देख रहा था, खिड़की के उस पार
जहाँ हवाएँ कैद न थी
न आशा की  किरणें बंदी
जहाँ बेचैनी और हतासा का शोर था!

लेकिन तुम्हारा प्रसन्न चेहरा
विनोदयुक्त आँखों की हरियाली
मेरे सारे विशाद को धो डाला
उदासी को पोत, एक कौतुक हास करने रहा

तुम्हारे मुख पर प्रसन्नता की सरल रेखा
आत्मिक विश्वास से चमकते देखा
जिसमें मुक्ति को उत्सुक,
खुशी के प्रयत्न की चमक थी

मैंने पुछा-"कैसी हो?"
"जी एक-दम ठीक-ठाक,
आशा करती हूँ, आप भी खुश होंगे"
कि हमें तमाम दुश्चिन्ताओं के बावजूद
प्रयत्न करना ही चाहिए
अपने-अपने आनंद का
कविता पाठ करते मन का।




मेरी प्रश्नाकूलता की जिज्ञाशा


तुम जब भी मिली
मेरी प्रश्नाकूलता की जिज्ञाशा
एक अजनबी, निर्विकार भाषा
टकराता रहा बारम्बार

जैसे रहस्यमई लहरें टकराती हो किनारों से
एक मादक गंध फुटता है
झूमते हुए चिनारों से।




उसका शिखर से गिरना पसंद है


थके हुए शरीर और संकल्पवान उम्मीद के साथ
बंजर और दरकती धरती पर उसने
खुद को रोपा है
कोई नमी या बादल की आद्रता भी
काश, संभावनाओं को उगा पाती

टकटकी लगाए आँखों में भी
स्वप्न की किरणें बिखरती है
बिबाई फ़टे पैरों में भी
आशा की हरियाली दमकती है

गंतव्य को पानी का ठहराव नहीं
उसका शिखर से गिरना पसंद है
कितना पसंद है हिरणों को कुलांचे मारना
आनंदित करता है नाचता हुआ मोर

असम्भव सा दिखने वाला प्रश्न
चुटकी में हल हो जाए
और मरू प्रदेश के पौधों के
सुमनों पर भवंरा गाए

बच्छर बाद की यह खुशियाली
कितना नैसर्गिक है, 
इसमें कितनी ताजगी
कितने सपने बिखरा हैं
तब किसी शब्द से कविता निखरा है

बर्षों बाद सहमी हुई, रुग्ण आँखों में चमक
और फ़टे होंठो पर मुस्कान से
शायद स्वर्ग की सुंदरता फीकी है
और किलकती खुशी, बुझी राख के बीच
पीसता हुआ जीवन
कभी उजाले की आहट में
मुस्कूरा पड़ता है।




आश्वासन बीमार तंत्र की औषधि है


उसकी नजरें भी नफ़रत करती है
बुद्बुदाहट और पैनी
इन्द्रियाँ और होती है नुकीली
वह अपनी संवेदनाओं के लिए लड़ता है
अपने बर्बाद हो चुके फ़सल पर
ईश्वर को कोसता है, सत्ता को गरियाता है

अधजले गोईठे की तरह
अपनी बदरंग हुई जिंदगी में
थोड़ा और राख पोतता है
तब वह पगड़ंडी पर नहीं
प्रश्नों के नोक पर चलता है
उतर में पहले फटकार मिलता है
फिर आधी संतावना
एक डेंग चलकर आधा खींचता हुआ

शक के भींगे उपले से उठता हुआ धुंआ
छल के चूल्हे से उठता है
मन में टहलती उम्मीद
कपटी चोट से लहूलुहान होता है
उसके सारे प्रश्न प्रभावहीन हो जाते हैं
आश्वासन बीमार तंत्र की औषधि है।



व्याकुल प्रश्न


हप्ते दिन की जली बासी रोटी
जब भुख का निवाला बनता है
तब निर्धारित करता है
दीनता की व्यथा
गरीब तय करता है करुण कथा...

फूटे थाली मे पनियाइल दाल या
नून-मिरच मे सानता भात
और तप्त होता है फटे हाल इंसान की आत्मा 
फ़टे हुए व्यार और कांटे से बिंधे पैर की पीड़ा को
एक चरवाहा ज्यादा बेहतर बताएगा 
और रुग्ण आँखों से जख्मो को सहलाएगा

एक मुश्किल चढ़ाई चढ़ती हुई स्त्री 
बेहतर जानती है,  
तड़फड़ाती हुई सुरक्षित उतर जाना 
भीतर की उबलती आग पर
कोई यूँ पानी डाल देगा
और वह कातर नेत्रों से ताकता
यूँ बला को टाल देगा

सरकार को कोसते,
अपनी दीनता को भोगते 
बंजर खेत मे कराहता किसान 
फ़सल की बर्बादी और 
बर्बादी की आबादी पर
टहलता है मुदत से 
गुम हो गई मुस्कान पर
व्याकुल प्रश्न पलता है।




स्मृतियाँ


अतीत की स्मृतियों की चुभन 
नंगे पैरों मे
कांटे की तरह चुभता है
कुछ यादो के साथ
बिते दिनों की राख होती है
अतीत का शोक गीत!
महामारी की तरह फैलता है
और पूरे प्रदेश में
लिप देता है अपने तीखे दंश से

कुछ समृतिया सिर्फ पीड़ा ही नहीं देती,
हमे खंघालती, संभालती भी है 
और स्मृतियों में गूँज उठता है 
पिता का बेसुरा राग
जिनके अनुशासन मे 
मेरा प्रत्येक कुचेष्ठा हारा है

स्मृतियो मे मेरी माँ
रुलाती नहीं बल्कि
मीठी लोरी सुनाती है
और इधर घोसलो से निकल
गोरैया फुदकने लगती है
मन चहकने लगता हैं।




स्वतः अकेली धुन की तरह


जो प्राप्त है, वही पर्याप्त है
उसे समझने के लिए एक विचित्र मस्तिष्क
योजनाएँ बनाने के लिए 
कालजयी प्रदीप आँखे
प्रकाशित रश्मियों की तरह
बिहड़ों में मार्ग बनाने के लिए पैर
निर्माण के लिए दो हाथ
नदी के दो किनारों की तरह
गंतव्य की ओर प्रस्थान करते
अपने श्रम का दान करते
विशिष्ठ, अतिविशिष्ठ हो जाना था

अपने सजीव देह पर 
मृतकाय लौ को ढोना
सुनानी थी अपने श्रम की भाषा में
अपना ही लिखा हुआ मौलिक निबंध
कुछ विशेष संस्मरण
हृदय में किसी का कोई हस्तक्षेप न था
न जागती आँखों में किसी की छवि
सबकुछ स्वतः अकेली धुन की तरह

शिकायत, कि लोग पहचानते नहीं
शिकायत, कि लोग सुनता, पढ़ता नहीं
शिकायत, कि शब्द खुद तय करता है रास्ता

वस्तुत: भाषा के कोलाज में
संवेदना के निर्मित साज में 
शब्द की सार्थकता स्वयं रचती है अपनी आवाजाही 
अपनी उपस्थिति का समर्पण
अपनी ही जीवन कविता को सजाना संवारना

थके और उदास देश में
हारे हुए प्राणी के वेश में
थक हारकर अपनी ही कातर और सहमी हुई आँखों में
जरा रुक कर सुस्ताना
अपने दिलों में बैठकर
स्वयं प्रभा को बुलाना।



उसका जागना


मेरे हृदय में
उस त्रासदी की गूँज है
जिसे भूख से बिलबिलाते
अपना भविष्य खाते
व्यवस्था की सड़ान्ध से आघाते
भोगा है मेरे पूर्वजों ने

उसकी कायर चुपियों पर,
मासूमियत से खिलखिलाते बेटियों पर
तुम्हारी बर्बरता का पौधा लहलहाया था,
और उदार उर्बरकों ने
स्वेद-खून बहाया था

मेरे हाथ में बर्बाद हो चुका भविष्य है
मै वर्तमान का ओजस्वी नया नरक
सामंती विचारों, सिपहसलारों, नरेशों,
खंडित हो चुके देशों, आओ
मै एक बजबजाता हुआ स्वर्ग दूंगा

सदियों से सोया ये सर्वहारा समाज...
नींद में ऐसे स्वप्न को देखता 
कुलबुलाता जा रहा और
एक ऐसे सवेरे का इंतजार करता आ रहा है
जहाँ तुम्हारे साम्राज्य का शोकगीत लिखा जाएगा

पूस की ठिठुरती हुई रात में
एक कृषक का
खेत में लहराती विचारधारा
उसके सामने दण्डवत करता
अलाव जलाता
उसे अपने तन की गर्मी दे रहा है
उसका जागना रोज का जागना नहीं, बल्कि
एक युग का जागना है



हर बार जन्म लूँगा


मेरा देह बंदी है
लेकिन मेरे विचार नहीं
एक दिन स्वप्नों की उड़ान लेकर
आऊँगा, बिल्कुल आजाद परिंदो की तरह

मै अपनी सड़कों पर लौटूँगा,
पत्थर उछालूँगा,
बिना किसी खौफ के
तुम्हारे दैत्याकर दरवाजे को तोड़ दूँगा
उसमें मै स्वयं को छिपाते
कुछ लोगों को उकसाऊँगा
अपनी स्वतंत्रता के विरुद्ध

कुछ लोग मुझे पीटेंगे
मै कुछ लोगों से चार-चार हाथ हो जाऊँगा
एक चौराहे पर खड़ा मै
भीड़ को ललकारता
अचानक किसी भीड़ में शामिल हो जाऊँगा

कुछ लोग मेरी आजादी को
बेहद ताज़ी खबर की तरह पढ़ेंगे
और मै-
तुम्हारे कुत्सित विचारों की दीवार ढाहकर
तुम्हारी क्रूरता की जबड़ों में हाथ डालकर
चीर दूँगा तुम्हारा आत्मालाप
तुम्हारी दृष्टता का कोरस

तुम खुद को श्रेष्ठ बताते
जितनी हत्याएँ करोगे
मै अपनी मुक्त कविता में हर बार जन्म लूँगा।



सर्वहारा एकजुट हो रहे हैं


मैं किसी और का भरोसा हूँ
निःसंदेह, किसी और का खोया हुआ विश्वास!
मात्र मेरी उपस्थिति भर से
कोई अपना स्वार्थ साध लेता है
लगा ही देता है-
छल की सुनहली छलाँग

और मै बड़ी तन्मयता से देखता हूँ
अपना बर्बाद हो चुका उपवन
मै स्वयं का यथार्थ भी नहीं हूँ
मै तो हूँ
किसी और का फूटता हुआ प्रभात

महल के ऐश्वर्य सुख के लिए
मैनें कोई प्रार्थना नहीं किया था
मै किसी और प्रयोजन के लिए
तुम्हारे स्वर्ग के दरवाजे तक आया हूँ
मुझे इसी तरह विस्फोटक लगाना है
सर्वहारा एकजुट हो रहे हैं
संसद की कार्यवाही यों ही चलने दो




आक्रमण


शरीर का जख्म
शरीर को यातना देता
शरीर को पाषाण बना रहा है
विष, एक शरीर को मृत्यु देता है
लेकिन सहस्त्रों देह को
नव जीवन देता है
सावधान, नीति-नियंता
तुम्हारे स्वर्ग पर आक्रमण होगा।




भूख



चौराहे पर भूख ताक रहा है
और बाट जोह रहा है
अपने श्रम पर लगने वाले दाम का
अपने जी तोड़ काम का

और उधर कीमत लगाने वाला देश 
पुरी निर्लज्जता के साथ
सम्पन्नता का चादर ओढ़ रहा है।




प्रेम


प्रेम बिल्कुल पास है
शांत हवा की तरह
हमारे एकदम पास
करता हुआ आलिंगन
गुनगुनाता हुआ तनमन




उम्मीद से फिसल गए


न्याय देनेवाला
न्याय से खेल रहा है
अन्याय, व्यवस्था का गौरव है

बेड़ियों में कैद इन्साफ
बंदिगृह की यातना झेल रहा है
बेवस आँसुओं पर पहरा है
राज बड़ा गहरा है

जंजीरों में कैद है मुस्कान
कितने ही अरमान कुचल गए
दम तोड़ती प्रयत्नशील आकांक्षाएँ
यातना सहते
उम्मीद से फिसल गए।



मौन


मौन समर्पण में प्रेम पल रहा है
तिल-तिल अभिलाषा जल रहा है
पर यह किसे खल रहा है



तारिक़ाएँ


प्रखर इच्छाओं के
झीनी परदों के पार
अनंत सर्जनाओं के द्वार
स्वप्नों की दुर्लभ छायाएँ
आकार ले रही है
रखवाली कर रही है
कल्पना की नायिकाएँ

रसवंत सागर से नहाई
चाँद की उज्ज्वला में
हँस रही है तारिक़ाएँ।



इच्छाएँ



इच्छाओं के बसंत में
उन्मादित है दिग-दिगन्त
पुष्पित हो रही है लताएँ
टहटही, रक्ताभ, पीतांबर रंग में
वायु में डोल रही दिशाएँ
स्वप्न के प्रकाश में 
स्मृति के आकाश में
उम्मीदें सजा रही है
रात की असंख्य उल्काएं



रक्त के छिंटे



आजादी के अमृत महोत्सव में
पूरे शान से फहरा रहा है तिरंगा
भूख की शिनाख्त की जा रही है
सड़कों पर कत्लेआम, तीर्थों पर दंगा

धमनियों में दौड़ता हुआ खुन
क्रूरता की बाजी लगा रहा है

पगदंडियों पर बारिश की नमी नहीं
रक्त के छिंटे हैं
कुछ ऐसे ही
डर, भय में इंसानियत बीते हैं




लौटना


जैसे दिनभर का थका सूरज
शाम को लौट जाता है क्षितिज में
जैसे आकाश के विस्तृत आँगन में
असंख्य तारे लौट आते हैं
पृथ्वी को अपनी टिमटिमाती मुस्कान सौंपने

वैसे ही मेरे स्वप्न
मेरे स्मृति के उजाले में लौटना
एक संगीतमय ध्वनि के साथ

जैसे सागर लौटती है
मेघों से होकर वारिश की बूँदों में
जैसे हवा की नमी छुकर
लौट आती है नदी की शीतलता
वैसे ही एक दिन लौटना

लौटना बचपन की मासूमियत
उम्र के ढलान पर
वृद्ध के मुस्कान पर
जैसे मौके की तलाश में
किसी निर्जन खंडहर में छिपी
तमाम चुप्पियों में पनाह लेती हिंसा
वापसी के लिए तत्पर रहती है

तुम्हारे भीतर मृत्यु का सन्नाता है
वर्तमान की पीड़ा का भय
छायाओं जैसा बढ़ता है अफ़सोस
तुम्हारे देह पर
अधखिले पुष्प झरते हैं




झूलसा हुआ चेहरा


क्या राम अपनी मर्यादा खो दिया
या मानवता पुरी तरह मृतकाय हो गया
यह जख्मों से टपकता हुआ खुन किसका है?
किसका है यह आग से झूलसा हुआ चेहरा
कहीं सुकूमारी सीता की तो नहीं है।




गंतव्य


तुम रेलवे स्टेशन पर जाकर
टिकट खिड़की पर टिकट मांगो
लेकिन गंतव्य का कुछ भी पता नहीं है
तो तुम्हें कहीं का भी टिकट नहीं मिलेगा
और तुम कहीं नहीं पहुँच पाओगे

कुछ धोखे इंसान को कामयाब बना देता है
और कुछ को तोड़ देता है
हुनर पहचानता है कि वह किस नस्ल का है
और कितने वेग के साथ तुम्हे
पटक देता है पृथ्वी पर




तुम्हारे होने का अर्थ


हजार तकलीफों के बावजूद भी
एक सुख मुस्कुरा रहा है सूर्य की किरणों में
अंतहीन अँधेरों की सुरंग से ही
प्रकाश का बहुत छोटा टुकड़ा झाँकता है तुम्हें
क्योंकि स्मृति को भी पता है
कि तुम भविष्य का इतिहास हो

हर रास्ता कहीं न कहीं लुप्त हो जाती है
और तुम अंतहीन रास्ते पर
चलने से बच जाते हो
तुम्हें, तुम्हारे होने का अर्थ मिल जाता है

मै हमेशा शांत और मौन रहता हूँ
फिर भी जान जाता हूँ
तुम्हारे संगीतमय ध्वनि का स्पर्श
एक पर्वत मौन रहकर देखता है मुझे




विनम्रता


विनम्रता इंसान का आभूषण है
और अस्थिरता मन का संतोष
असंतोष भ्रम को उतपन्न करता है
भ्रम हिंसा का पोषण करता है
और हिंसा सबसे पहले
स्व के विवेक की हत्या करती है

तुम उस युद्ध को कभी नहीं जीत पाओगे
जहाँ कौशल का कोई नेतृत्व न हो
बल, पराक्रम का अखाड़ा है
जबकि पुरुषार्थ विरोचित त्याग का शौर्य।




रीत जाना था


मैनें अपने विचारों का अश्व दौड़ाकर
कुछ ताज़ी उम्मीदों को फहराकर
खुली वायु, स्वछंद आकाश में
अपनी कामनाओं के किंचित विकाश में
मुक्ति चाहा था

बंदिशों के विरुद्ध
जीवन की सूक्ति चाहा है
और मुझे अनायास ही
बेड़ियों मे जकड़ लिया गया
अपना इच्छित संवाद जरते हुए
अपराध में पकड़ लिया गया

अपने अधिकार का कोरस करते
भूख की याचना करते
अपने ईमानदर श्रम का दम्भ भरते
मेरी रुमानियत भरी सुवह में
षडयंत्र की कीलों में जड़ दिया गया

मेरा उधेश्य वेदना के गीत गाना नहीं
बल्कि
आगामी प्रभात की किरणों मे 
रीत जाना है



अंधेरा सीना तान के खड़ा है


अक्सर छला गया
और भ्रमित करते प्रकाश के पीछे
अंधेरा सीना तान के खड़ा है
उसके भीतर का आदमी अजेय है
जो उससे मरते-मरते लड़ा है
लेकिन उसके संकल्प से
कायरता का गान बड़ा है

बसंत वहाँ उतरती है
जहाँ आह्लादित फूल खिलता है
लेकिन तितलियों की उदासीनता
बाग को जलते हुए देखती है

उद्गम से निकलती नदी
स्वच्छ नीरा होती है
कितने-कितने समतल पर्वत को टहलती
कितने नर्क को धोती है

धर्म एक खुमारी मात्र है
बाजारीकरण में तब्दील होती
आस्था और शान्ति को कुचलती
श्लोक पाठ एक शोर है बस।




अब सुरज अस्त नहीं होगा


तुम देते रहो अर्घ
सूरज को तर्पण करते रहो
दूध जल
देह को बनाओ समर्थ
मैं जाता हूँ सूरज को रोकने
उसके अस्त होने से खींचने

मैंने अपने बाजुओं को बलिष्ट बनाया
हथेलियों को कसकर बाँधा
लड़खड़ाते पैरों को धरती पर गाड़
मजबूत खूंटे की तरह

हे तेजोमय उदीयमान भास्कर, रुको
मैं तुम्हारे क्षितिज पर आ रहा हूँ
तुम्हे ढलान पर गिरने से बचाने
अपना कर्मठ कंधा अड़ा रहा हूँ

सूरज अब अस्त नहीं होगा
नहीं होगा अब अंधेरों का पहरा
मैं रथ से अश्वों को खोल दूँगा
साहस के साथ स्वाधीनता को बोल दूँगा

उस प्रतिमा को उतार लूँगा 
जो धरती का सुख है
प्रकाश्वती आनंद का सुख है
जो जीवन का आगाह है
जो भाषा का प्रवाह है
जो कालजयी प्यार है
जो चेतना का विस्तार है

रथ के पहिए आग है
प्रगति का वही राग है
विकास होगा पहिए रुकेंगे
अपने सीने को टेक कर
चेतना का चक्र फेंक दी

अब सूरज नहीं जाएगा क्षितिज पार
बंद होगा काली पाषाणी द्वार
मैंने बंजर भूमि को उर्बर बनाया
दमकता हुआ फ़सल उगाया
सूरज को यहीं रखूँगा
घरों में, दालानों में
संकल्पों में, विश्वासों में
साँसों के मचानों पर
एडियाँ रोपे ढलानों पर
अब सूरज अस्त नहीं होगा।

           

          

सुंदर कविता 



गुलाब काँटो में
कैसे खिलता है?
सूर्य की प्रखर किरणो में
तपकर भी-
सुगन्ध कहाँ से लाता है?
कैसे बनती है
एक सुंदर कविता

पूछो इससे 
बंजर मिट्टी को तोड़ते
पसीने को जलाते
इंसान को पढ़ो
क्या तुम सुन रहे हो,
कि यह टूटते पत्थर का
रुदन है या
मिट्टी में सने
खून का चीत्कार

शब्दों में ढूंढो, 
जीवन की एक मुकम्मल तस्वीर
पढ़ो, संवेदना की गूँज
समर्पण का उच्छवास
सत्य का प्रकाश




अभिलाषा को बहने दो

                
संभावना के क्षितिज पर
अनंत उम्मीदों का सूर्योदय
हो रहा है
स्वप्न सरिता में
अपेक्षाओं का नीलकुसुम
धवल शिखरों पर
निर्मल तुहिन कण से
अपने अंजन की मुक्ता को
धो रहा है

पथ का निर्वात शून्य
संवाद कर रहा है
जागरण से
प्राणपन से
जीवनधन से
और प्रेम
कवि हृदय से निकलकर
ढूंढ रहा है सौंदर्य की आभा
बलिष्ठ भुजाओं का आलिंगन
प्रगति का चिंतन
भविष्य का निमंत्रण

कवि! सुनो...
मनोहर शब्दों को
बसंत के मुस्कुराहटों से
प्रेमालाप करने दो
कल्पनाओं के झुरमुट में
सृजन का स्वर बहने दो
बहने दो निर्माण विश्व का
वैभव का, आशा की चिंगारी का
काल के कपाट पर 
संघर्षों को पलने दो
कवि...!
अभिलाषा को बहने दो
        

               
कर्ज


दोपहर होते होते
सूरज बरसा रहा है आग
सुबह की ओस से सिक्त दूब
सिहर उठी है
जैसे महाजन के सामने
कर्ज में डूबा इंसान



बसंत


हवा के शीतल झोकों में
मैंने शब्दों को झुलाया
किरणो के
एक एक तारो में लटकाया
कोयल राग सुनाया
भंवरे मधु रस में अलसाया
तब सुमन समुह पर
बसंत धीरे-धीरे आया




वो जुनून ही था


माउंटेवरेस्ट के दुर्गम उचाईयों पर
फ़तह हासित करते समय, 
विजय गर्व से मुस्कुराती हुई
विजेता, सुनो....!

चढ़ाइयाँ चढ़ते वक्त
जब पैर लड़खड़ा रहा था
साहस दम तोड़ रहा था
हवाएँ चकमा देने लगी थी
तब..., अन्तरात्मा की ध्वनि
जुनून का संकल्प लेकर ही
अनन्त आकाश को ललकारा था

वो कौन था? चक्रवर्ती!
जिसके अश्व पर सवार
प्रस्थान किया था कुरुक्षेत्र में
विश्व विजेता बना था...
साहस, पराक्रम, सौर्य का अभेद कवच
नहीं...! नही...!! 
विस्फोटक चिंगारी का
विभत्स रूप में अवतार
अक्रांतक, जुनून ही था।




नीरव शंख बजा रही है


कवि रच रहा है शृंगार
बसंत का निर्मल बहार
सौंदर्य का नभ विस्तार
जीवन का सत्य सार
और कविता मुस्कुरा रही है

नन्ही तूलिका नीले आसमान में
एक मोहक तस्वीर बना रही है
सम्भावना के अंकुर निकल रहे हैं
संप्रेषण की शब्दावली रच रही है
निर्माण की नई भूमिका में
और कविता गा रही है

कवि! मेघ के सर्जना के शब्दों में
स्वर्ग का लिपि अंकित कर रहा है
पवित्र सुरों में बहता चंदन
अपने कोमल स्पर्श से
गढ़ रहा है प्रेम की परिभाषा
श्रम की संजीवनी
विश्वास की महक
श्रद्धा के फूल
और कविता नीरव शंख बजा रही है



स्पर्श


जिस कोमलता से
स्पर्श करती हो तुम
चाँदनी भी उसी सहजता से
छुती है तुम्हारी देह
जैसे घास की फुनगी छुती है मेह

वायु तुम्हारे साँस से गुजरती है
जैसे अंतर की ध्वनि बजती है
सौंदर्य की अनुभूती करती कविता
करती है युगों से नेह


बुलडोजर


रो रहा है इंसानियत
हैवानियत हँस रहा 
क्रूरता को अंजाम देने
विस्थापन का नाम देने
एक सनकी निजाम देने
ध्वंश हिंसा का नाम देने
काँप रहा घृणा धर-थर
भयभीत नेत्र का स्वप्न मर मर
लाचार बधीर भी चीख रहा है
चिंघाड़ रहा है बुलडोजर



उम्मीद


जब मेरी अंतस की वेदना
व्याकूलता में बिलखने लगे
पीड़ा में चटखने लगे
यातना में बिखरने लगे
तब मैं उम्मीद को जगाऊँगा
बूँद की शीतलता लेकर
भूख को सुलाऊँगा।


नियति


उस समय प्रत्येक शब्द मौन था
जब बोलना जरूरी था, और
सच की खिल्ली उड़ाई जा रही थी
जब झूठ की आरती उतारी जा रही थी
बताओ भाई, वह नियति कौन था



बीज बोना


प्रेम के अल्फाजों को
स्वच्छ बादलों में पिरोना
जहाज से सौगात ढोना है

समंदर का संगीत
तरंगों का उन्मत्त गीत
एकाग्रचित भाव से देखना
कोमल पंक्तियों को चुनना
नई सृजन का बीज बोना है


अपील


उसका अपील
छल की स्याही से लिखा गया है
जबकि मेरा अपील पीड़ा की आँसू से

उसका अपील
धूर्तता के गिनियों के साथ
पेश किया जाता है
मेरा अपील याचना में डूबे दुःख के साथ

उसका अपील
सत्ता के आदेश की तरह पढ़ा जाता है
जबकि मेरा अपील हिकारत से देखकर
डाल दिया जाता है कूड़ेदान में
क्या फर्क पड़ता है?
बेचारी किस्मत के व्यवधान में

अब मै भी कैसी बेतुकी बातें करता हूँ
स्वर्ग कभी मिला है नर्क से
कब आसमाँ धरती से मिलने को आतुर हुआ
कभी प्रेमालाप नहीं किया पाप और पुण्य
न विचार एक हुआ देवता और दानव का



रिक्त स्थान


मैं उन दिनों उल्लास से देखा था
जब तुम देहरी पर 
अपनी चंचलता बिखेर रही थी
हवा की धीमी बहाव में
बहा रही थी शोखीपन को 
आँखों में इंद्रधनुषी तरलता थी
और पैरों में स्वछंद उड़ान

आज मैं भावहीन कौतुहलता से
देख रहा हूँ
उस रिक्त स्थान को
परम्परा की ढलान को
मेरा उल्लास मृतकाय 
शोकगीत गा रही है
तुम्हारी अनुपस्थिति से 
उत्पन्न उदासी, 
अनंत पीड़ा में नहा रही है।


जीवन गुजर जाता है


एक सुवह आने के बाद
यह निश्चय करना कि
दुनिया सुखों का पिटारा है
अगली सुबह का इंतजार करते हैं
जिन्दगी भर

जीवन-पथ पर चलते हुए
अचानक प्रतिरोध आया
विपतियों का पहाड़ टूट पड़ा
उस वक्त यह निश्चय करना कि
जिन्दगी दुःखों का समुद्र है
जीवन गुजर जाता है।

~सुरेन्द्र प्रजापति



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