धरती तप रही है

सुरेंद्र प्रजापत की कविताएँ   




 1. अभिनन्दन 

अभिनन्दन!

उस शिल्पी का...

जिसने राग गढ़ा, 

अनुराग पढा


मैं तो...

इस विस्तृत मार्ग पर

बहुत अल्प चला...।


2. प्यास

यही तो विडम्बना है

आगे चलता है...

समंदर भर का दुख

एक मुट्ठी आनंद की तलाश में...!


साथ चलता है

सावधान करता खामोशी

चेतना की आश में...!


पीछे...बहुत पीछे 

रह जाती है संभावना

जीत की प्यास में...!

3.धरती तप रही है

ऐसे समय, साहित्य में

जीवन के लालित्य में

जल को पुकारना 

सृष्टि की आराधना

जीवन की... 

पुनर्रचना का आह्वान

यह कैसा ढीठ सा गान।


मूल्यवान, गतिमान

प्रदूषित किया जीवन तत्व

पृथ्वी की कोख में स्वाभिमान से

उड़ा रहे हैं, यान

निर्मित किया तूफान

यह कैसा ढीठ सा गान।

 ( *धरती तप रही है* से)


~सुरेंद्र प्रजापति


3. आग में खिलता हुआ कमल


कैसा था तुम्हारा प्रेम ?

बसंत में मुस्कुराता गुलाब

या

आग में खिलता हुआ कमल...

या वतन का केशरिया बल...


कैसा था तुम्हारा प्रेम?

.........................


~सुरेंद्र प्रजापति


शौर्य गीत गाया होगा


ऐ चमन के वीरों

फांसी पर झूलते

स्वाभिमान से झुमते

फंदा भी मुस्कुराया होगा


ऐ वतन के कोमल दल

तेरे इश्क़ पर फ़िदा होकर

लाखों नयन सजल होकर

शौर्य का गीत गाया होगा


~सुरेन्द्र प्रजापति



          

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