Shayri:



पथ पर हूँ, और बादल गरज रहा है,


पथ पर हूँ, और बादल गरज रहा है,
प्यासी धरती, बूंदो को तरस रहा है।

बरस रही उम्मीदें, पानी गीर रहा है,
बिजली से कोई नभ को चिर रहा है।

बेवस किसान है उपर देख रहा है,
संभाव्य प्रभा पर भूख सेक रहा है।

जैसे सता से आश्वासन आता है,
जन विकास के योजना घर्राता है।

योजना आएगा जनता का सुख होगा,
फिर क्यों आनंद उत्सव में दुःख होगा।

पर नजीर समता का मार्ग भूलता है,
कठोर आदेश से घोर श्रम चुनता है।

बेवस कृषक, और धरती तपती है,
बादल नभ में उमड़ घूमड़ ठगती है।

सता का आदेश कि आशा बरसो,
पर खबरदार, बूँद पानी को तरसो।

                       -सुरेन्द् प्रजापति

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