*स्पर्श*
जिस कोमलता से
स्पर्श करती हो तुम
चाँदनी भी उसी सहजता से
छुती है तुम्हारी देह
जैसे घास की फुनगी छुती है मेह
वायु तुम्हारे साँस से गुजरती है
जैसे अंतर की ध्वनि बजती है
सौंदर्य की अनुभूती करती कविता
करती है युगों से नेह
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*बुलडोजर*
रो रहा है इंसानियत
हैवानियत हँस रहा
क्रूरता को अंजाम देने
विस्थापन का नाम देने
एक सनकी निजाम देने
ध्वंश हिंसा का नाम देने
काँप रहा घृणा धर-थर
भयभीत नेत्र का स्वप्न मर मर
लाचार बधीर भी चीख रहा है
चिंघाड़ रहा है बुलडोजर
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*उम्मीद*
जब मेरी अंतस की वेदना
व्याकूलता में बिलखने लगे
पीड़ा में चटखने लगे
यातना में बिखरने लगे
तब मैं उम्मीद को जगाऊँगा
बूँद की शीतलता लेकर
भूख को सुलाऊँगा।
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*नियति*
उस समय प्रत्येक शब्द मौन था
जब बोलना जरूरी था, और
सच की खिल्ली उड़ाई जा रही थी
जब झूठ की आरती उतारी जा रही थी
बताओ भाई, वह नियति कौन था
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*बीज बोना*
प्रेम के अल्फाजों को
स्वच्छ बादलों में पिरोना
जहाज से सौगात ढोना है
समंदर का संगीत
तरंगों का उन्मत्त गीत
एकाग्रचित भाव से देखना
कोमल पंक्तियों को चुनना
नई सृजन का बीज बोना है
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*अपील*
उसका अपील
छल की स्याही से लिखा गया है
जबकि मेरा अपील पीड़ा की आँसू से
उसका अपील
धूर्तता के गिनियों के साथ
पेश किया जाता है
मेरा अपील याचना में डूबे दुःख के साथ
उसका अपील
सत्ता के आदेश की तरह पढ़ा जाता है
जबकि मेरा अपील हिकारत से देखकर
डाल दिया जाता है कूड़ेदान में
क्या फर्क पड़ता है?
बेचारी किस्मत के व्यवधान में
अब मै भी कैसी बेतुकी बातें करता हूँ
स्वर्ग कभी मिला है नर्क से
कब आसमाँ धरती से मिलने को आतुर हुआ
कभी प्रेमालाप नहीं किया पाप और पुण्य
न विचार एक हुआ देवता और दानव का
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*रिक्त स्थान*
मैं उन दिनों उल्लास से देखा था
जब तुम देहरी पर
अपनी चंचलता बिखेर रही थी
हवा की धीमी बहाव में
बहा रही थी शोखीपन को
आँखों में इंद्रधनुषी तरलता थी
और परों में स्वछंद उड़ान
आज मैं भावहीन कौतुहलता से
देख रहा हूँ
उस रिक्त स्थान को
परम्परा की ढलान को
मेरा उल्लास मृतकाय
शौकगीत गा रही है
उम्हारी अनुपस्थिति से
उत्पन्न उदासी,
अनंत पीड़ा में नहा रही है।
***
*जीवन गुजर जाता है*
एक सुवह आने के बाद
यह निश्चय करना कि
दुनिया सुखों का पिटारा है
अगली सुबह का इंतजार करते हैं
जिन्दगी भर
जीवन-पथ पर चलते हुए
अचानक प्रतिरोध आया
विपतियों का पहाड़ टूट पड़ा
उस वक्त यह निश्चय करना कि
जिन्दगी दुःखों का समुद्र है
जीवन गुजर जाता है।
***
~सुरेन्द्र प्रजापति

