जोड़ने के लिए
मेरे सारे संघर्ष रेत की तरह ढह गए
सारे स्वप्न कालातीत हो गये
और प्रेम पीड़ा की दास्तान बन
अंतिम गान गा रही है इन्ही गलियों में
आगत स्वर्णिम कल के लिए
हमने निश्चय किया अपनी पराजय
शामिल नहीं करेंगे हम
अपने निजी स्वार्थ के आकाश में
अपनी आजादी के सेहत के लिए
निवेदन करेंगे
समर्पण की जिल्द में
सामर्थ्य की अपनी आहुति
संकल्प का सौंदर्य
प्रतिदिन के व्यय में जोड़ने के लिए
सहयात्री
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मैं ताप को बचाए रखने के लिए
अपने ही जैसे कुछ लोगों की बात करता हूँ
जैसा हूँ वैसा ही कहता हूँ
कुछ लोगों को रोने, चीखने, चिल्लाने की
उतनी ही आजादी मिली है
कि वे अपनी बिचूड़ी हुई हड्डियों में दफन कर ले
उतना ही हँसना है
कि झक उजाले पर धब्बा न आ जाए
समझ उतना ही कि_
पीड़ा की गाँठ न खुल जाए
विरोध की सभी भाषाएं भूल जाएँ
प्रतिरोध की आग से सहमें
और अपने खिलाफ चल रहे षड्यंत्रो की फन पर
सिर्फ रुदन का गीत गाएँ
मेरी कवि, चालाकी और शोषण के आँसू को जानता है
उनकी सिसकती व्यथा को पहचानता है
मेरा कवि उस अक्षमता का शोर नहीं
बल्कि अपने अनुभव का सार बनता है
अपने ही उजाले मे सहयात्री बनकर
साथ चलता है
मेरा कवि धैर्य को इकट्ठा करता है
कविता में भूख और गरीबी
प्रेम और नफ़रत और जीवन के मायने लिखता है
तब कहीं चीख, और पीड़ा, और व्यथा
धीरे-धीरे_
अपने अधिकार और स्वतंत्रता में दिखता है
एक शब्द जीवन को खुद को झाँकने का अवसर देता है,
व्यतीत हुए समय में
एक-एक घटनाओं में
पृष्ठों की तरह खोलता है
पारदर्शी शीशे की तरह वर्तमान बोलता है
इन तमाम पुनरीक्षण के बाद
एक थका हुआ मौन आदमी भी
बीते समय की उम्मीद,
और अपने लोगों की आवाज चलता है
इस यात्रा में, एक समूह बनता है
समूह संघर्ष में जीता है
और साहस का प्रकाश हो जाता है
एक डरा हुआ एक हारा हुआ
छला हुआ, व्यवस्था का मारा हुआ
इस एक-एक अनेक को समूह में
साहस का कवच देता है मेरा कवि
और प्रतिरोध का कठोर ताप,
इस तरह भय और मौन को तोड़कर
अपने कांपते वर्ग को जोड़कर
आदमी समूह का शक्ति बनता है
और वर्ग शत्रु पर प्रहार करता है
हमारे कवि की कविता_
अपने वर्ग मित्रों को खड़ा होना सिखाता है
निर्भय और संकल्प बतलाता है
और शस्त्र अपने शत्रु को
पतन का रास्ता दिखाता है।
जेठ की गर्म कालीन पर
जेठ की गर्म कालीन पर
कुछ छाले पड़े चलते हुए
कुछ निशान मिटे
कुछ चीखें खामोश हुई
धमाके की धुंध में
बादल कुछ ज्यादा बेचैन दिखे।
जो सड़क पर फैल रहा था,
आदेश के अस्वीकार की भाषा में
वह सिर्फ डामर नहीं,
उनके हिस्से का
उम्मीदों का आसमान था,
जिसे मलबे का शक्ल दिया गया,
और विकास के मानचित्र पर समेट दिया गया।
तपती हुई दोपहर
विशाल चट्टान की तलहटी से
जब उठती है कोई कराह,
मशीनों का शोर और तीखा हो जाता है,
ताकि सुनाई न दे
पसीने और खून के आपस में मिलने का मौन
धमाका थमा, धुंध छँट गई
मगर जेठ की उस लहकती सड़क पर
मिटे हुए निशानों के नीचे—
एक और इतिहास चुपचाप दफ़्न हो गया।
